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स्टरलाइट टेक भारतीय नौसेना के लिए अगली पीढ़ी का संचार नेटवर्क विकसित करेगी

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गुरूग्राम, भारत, February 27, 2018 /PRNewswire/ —

रू3500-करोड़ का सिस्टम एकीकरण प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना को विश्वस्तर पर सबसे आधुनिक नौसैनिक बलों के अनुरूप डिजिटल संचार नेटवर्क से लैस करेगा ।

Sterlite Tech [BSE: 532374, NSE: STRTECH], जो कि वेब-स्केल डिजिटल नेटवर्कों में वैश्विक तकनीकी अग्रणी कंपनी है, को भारतीय नौसेना के संचार नेटवर्क के डिजाइन, निर्माण और प्रबंधन के लिए रू 3500-करोड़ का एडवांस पर्चेज आर्डर मिला है। इससे भारतीय नौसेना को विश्वस्तर पर सर्वोत्तम नौसैनिक बलों के अनुरूप डिजिटल प्रतिरक्षा श्रेष्ठता प्राप्त होगी।

पहली बार भारत में इतने बड़े पैमाने पर एक एकीकृत नौसेना संचार नेटवर्क निर्मित किया जाना है। नौसेना का संचार नेटवर्क बेहतर प्रवाह क्षमता (थ्रूपुट), उच्चकोटि की सुरक्षा सेवाओं, और नेटवर्क के आसान प्रबंधन वाली खूबियों से लैस एक अधिक स्मार्ट नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर होगा। इस करार के तहत Sterlite Tech अपनी सिस्टम एकीकरण क्षमताओं के माध्यम से एक दशक से अधिक समय तक संचार नेटवर्क को डिजाइन, निर्मित और प्रबंधित करेगी।

Dr Anand Agarwal, CEO, Sterlite Tech ने इस संबंध में कहा कि, “उच्चकोटि के व्यापक, भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार किए जाने वाले नेटवर्कों के माध्यम से भारत की प्रतिरक्षी क्षमता मजबूत बनाने में भूमिका निभाने का अवसर मिलना हमारे लिए गर्व की बात है।” उन्होंने आगे बताया कि “जम्मू एवं कश्मीर में भारतीय थलसेना के लिए घुसपैठ-रहित संचार नेटवर्क निर्मित करने का हमारा हाल का अनुभव, नौसेना के संचार नेटवर्क के विकास के दौरान हमारे काम आएगा। सॉफ्टवेयर से सिलिकॉन तक की हमारी अद्वितीय क्षमताओं के साथ, भारतीय नौसेना के लिए यह सम्पूर्ण रणनीतिक नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए हम एकदम तैयार हैं।”

परियोजना की विशेषताओं के संबंध में, KS Rao, COO और MD (दूरसंचार उत्पाद एवं सेवाएं), Sterlite Tech, ने कहा कि, “भारतीय प्रतिरक्षा के लिए कार्य करना और इतने व्यापक एकीकृत संचार नेटवर्क को निर्मित करना हमारे लिए गौरव की बात है। मास्टर सिस्टम्स इंटिग्रेटर के रूप में, हम दो लेयर वाली केंद्रीय प्रबंधित IP बैकबोन पर एक कन्वर्ज्ड MPLS इन्फ्रास्ट्रक्चर की योजना और डिजाइन में नेतृत्व करेंगे। यह भारतीय नौसेना को प्रशासनिक और प्रतिरक्षा कार्यों के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय डिजिटल हाईवे उपलब्ध कराएगा।”

बेजोड़ संभावनाओं तथा आकार वाले इस प्रोजेक्ट में एक उच्च क्षमता वाला IP-MPLS (इंटरनेट प्रोटोकॉल- मल्टी प्रोटोकॉल लेबल स्विचिंग) नेटवर्क निर्मित किया जाना शामिल है। पूरा हो जाने पर यह भारतीय नौसेना की अनेक साइटों और भारतीय प्रशासित द्वीपों को जोड़ेगा।

Sterlite Technologies के बारे में:

Sterlite Technologies Ltd, [BSE: 532374, NSE: STRTECH] वैश्विक तकनीकी अग्रणी कंपनी है जो अधिक स्मार्ट नेटवर्कों को डिजाइन, स्थापना व प्रबंधन करती है। Sterlite Tech 100 से अधिक देशों में विविध उत्पाद, सेवाओं और सॉफ्टवेयर में डिजिटल वेब-स्केल पेशकश करती है। भारत, चीन तथा ब्राजील में कंपनी की अत्याधुनिक उत्पादन इकाइयां स्थित हैं और दो सॉफ्टवेयर डिलीवरी सेंटर भारत में स्थित हैं। अगली पीढ़ी के नेटवर्क अनुप्रयोगों के लिए अधिक स्मार्ट नेटवर्कों के लिए Sterlite Tech का ब्राडबैंड अनुसंधान केंद्र भारत का अपनी तरह का एकमात्र उत्कृष्टता केंद्र है। सशस्त्र बलों के लिए घुसपैठ-रहित स्मार्टर डेटा नेटवर्क, भारतनेट के लिए ग्रामीण ब्राडबैंड, स्मार्ट शहरों का विकास, तथा हाई-स्पीड वाले फाइबर-टू-दि-होम (FTTH) नेटवर्कों की स्थापना, कंपनी को सौंपी गई कुछ प्रमुख परियोजनाएं हैं।

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पैडमैन – पुरुष-विरोधी मानसिकता का नंगा नाच

अगर बात सिर्फ सेनेटरी नैपकिन की होती तो कोई बात नहीं थी अगर बात सिर्फ शौचालय बनाने की होती तो भी कोई बात नहीं थी| मगर हर बात में स्वतः ही पुरुष के प्रति घृणा कहाँ से आ जाती है यह समझ से परे है| जब शौचालय पर फिल्म की तब भी आदमी को गाली दी बल्कि शौच करते हुए आदमी की फोटो तक सोशल मीडिया पर डाल दी, आदमी की इज्ज़त होती नहीं ना| हर चीज़ को आदमी के अत्याचार से जोड़ दो शौचालय बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पुरुष शौच करती हुई महिला तक को नहीं छोड़ते हैं| किस प्रकार का लॉजिक है यह ?

मैं उस ज़माने की हूँ जब सेनेटरी नैपकिन भारत में कदम रख रहे थे| यह उस समय की बात है जब केयरफ्री नाम का संभवतःएक ही ब्रांड आता था| वो भी किसी काम का नहीं था विशेषतौर पर मेरी जैसी लडकियों के लिए क्योंकि हम स्कूल जाती थी, साईकल चलाती थी और कबड्डी भी खेलती थी| सेनेटरी नैपकिन नहीं थे तो काम कैसे चलता था ? छोटे गाँव और कस्बों में कपडे की दुकान पर सस्ते सूती कपडे के थान मिलते थे और रूई तो थी ही| मैं ऐसे स्कूल में भी पढ़ी हूँ, जहाँ ढंग का टॉयलेट भी नहीं था| मतलब पैड बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी| मगर मुझे याद नहीं कि मैं या मेरे साथ की किसी लड़की ने कभी इसके लिए पूरी पुरुष जाति को ज़िम्मेदार ठहराया हो| हमने उसमें से रास्ता निकाला और आगे बढ़ते गए| सूती कपडे के साथ-साथ घर के पुराने सूती कपड़ों का भी इस्तेमाल होता था, जिसको फिल्म वाले ओल्ड रग्स यानी चीथड़े बताएँगे| फिर आया मिस यूनिवर्स का दौर जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी| सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय के मिस वर्ल्ड बनने के बाद ताबड़तोड़ कॉस्मेटिक और सेनेटरी नैपकिन के ब्राण्ड भारत में आये| हमारे लिए राहें आसन हुई मगर दुष्प्रचार के साथ कि हम भारत की स्त्रियाँ गन्दगी से मासिक धर्म का निर्वाह करती है, हम बेचारी गरीब और सताई हुई हैं इत्यादि| सेनेटरी नैपकिन बेचने का यह तरीका था और इसके लिए सिस्टेमेटिक ब्रेनवाशिंग की गयी| हम सूती कपडे और रूई इन्स्तेमाल करते थे, इन्होने प्रचार किया कि हम गन्दा कपड़ा और गन्दा कागज़ इस्तेमाल करते हैं|

खैर सेनेटरी नैपकिन चल पड़े बाज़ार में क्योंकि इनकी ज़रुरत भी थी| तरह तरह के प्रचार से इनको बेचा गया छू लो दुनिया, कर लो सब मुट्ठी में जैसे अगर वो 3 दिन रुक गयी तो दुनिया हाथ से निकल जाएगी| ध्यान देने की बात यह है कि menstrual कप, पीरियड पैनटी जैसे अन्य तरीकों का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया| क्योंकि उनको बार- बार खरीदना नहीं पड़ता, बाज़ार आगे कैसे बढेगा|

क्या हम गन्दी चीज़ें प्रयोग करती थी –

व्यक्तिगत साफ़ सफाई सबकी अलग-अलग होती है| कोई रोज़ नहाता है तो कोई हफ्ते में एक बार, कोई कपड़े धोये और प्रेस किया बिना नहीं पहनता तो कोई मुचड़े कपड़ो में प्रसन्न है| कहने का अर्थ यह है कि जो वैसे साफ सुथरी नहीं रहती वो मासिक धर्म के दौरान भी गन्दी ही रहेगी| एक औरत अगर गन्दगी से रहती है तो यह पूरे भारत की स्त्रियों की समस्या नहीं है| मगर ठीक है आपको पैड बेचना है तो कुछ भी कहिये| मज़े की बात यह कि इन् लोगों ने प्रचार किया कि यह लोग बेचारी पैड बनाती, धोती, सुखाती हैं फिर प्रयोग करती है| अब इनसे पूछिए कि पीरियड पैनटी को भी तो धोया जाता है और आजकल रीयूज़ेबल पैड भी आते हें है| वो क्या हें, उनको भी धोया, सुखाया जाता है|

सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स क्यों –

सस्ते नैपकिन खरीदेंगी महिलाये? मेरे मोहल्ले में एक सस्ते लोकल नैपकिन बेचने वाली महिला आई थी जिस से किसी ने भी नहीं खरीदा, पैड में कोई खराबी नहीं थी बस उस पर कोई बड़ा ब्रांड का नाम नहीं था| यहाँ शनेल ब्राण्ड की फर्स्ट कॉपी खरीदने वाली महिला जब सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स की बात करती है तो हंसी आती है| हजारों रुपये ब्रांडेड कास्मेटिक पर लगा देने के बाद सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स याद आया है| सरकार कह रही है कि सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की आवश्यकता होती है वो महँगा है| हर बात पर सरकार और पुरुषों पर दोष मढने वाली महिला को यह बात नहीं समझ आएगी| दोष देने से बेहतर होता रास्ता तलाश करना जिससे कच्चा माल भारत में पैदा हो सके मगर इतनी मेहनत कौन करे दोष देना आसान है| और दोष भी कैसा ज़रा भाषा का चुनाव देखिये –

इनका मानना है कि सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स है वियाग्रा पर नहीं क्योंकि ज़्यादातर नीति बनाने वाले 65 साल के वृद्ध हैं जिनको स्तंभन दोष हो चुका होता है| जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि किसी भी चीज़ को बेचने के लिए यह लोग किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| एक फेमिनिस्ट की सोच वियाग्रा, सेक्स, स्तन, लिंग से आगे नहीं बढ़ पाती| किसी भी विषय पर बात करवा लीजिये यह घूमकर इसी पर आ जायेंगी|

फ्री ब्लीडिंग से सेनेटरी नैपकिन तक –

कुछ साल पहले किरण गाँधी नाम की एक महिला लन्दन में बिना पैड पहने मैराथन दौड़ी थी और उसको बहुत बहादुर मानकर पुरस्कार भी दिया गया था| एक तरफ फेमिनिट्स लोग पुरुष पर सब दोष मढ़कर सेनेटरी नैपकिन का प्रचार करते हैं दूसरी तरफ यह महिला बिना पैड के दौड़ती है| कोई इनसे पूछे सशक्तिकरण का अर्थ यदि आदिम काल में लौटना है जहाँ ना कपड़े हों ना सुविधाएँ तब तो सबको सशक्त करना आसान है| इसको फेमिनिस्ट्स ने फ्री ब्लीडिंग का नाम दिया है| उसने अपना अनुभव बताया था कि कैसे उसको पुरुषों ने टोका कि, “मैडम आपके कपड़ों पर दाग हैं|” यह उनको पितृसत्ता का दमन लगा था| इस प्रकार के तर्क के हिसाब से यदि मैं किसी को टोकूं कि आपके कपड़ों की सिलाई खुली है या दाग है तो उसे मातृसत्ता का दमन माना जाये|

इनके लॉजिक से चलने वाली महिलाएं बहस करती हैं तो कहती हैं कि आप लोग नहीं जानते कितना दर्द है माहवारी और बालक को जन्म देने में| तो पुरुष का दर्द क्या आप समझती हैं ? आप खुद कंफ्यूज है कि करना क्या है फ्री ब्लीडिंग या सेनेटरी नैपकिन|

पीरियड टैबू का ढिंढोरा पीटने वाली महिलाओं से पूछे कोई कि इसको टैबू बनाया किसने? स्वयं महिलाओं ने ही ना, घर के पुरुष को तो पता भी नहीं चलता कि लड़की को माहवारी शुरू हो गयी है| एक और बात कि पीरियड्स के बारे में बात नहीं कर सकते, यह बिलकुल गलत है जहाँ ज़रुरत होती है वहां करते हैं| सड़क चलते पीरियड, सेक्स बात क्यों क्यों ज़रूरी है पहले कोई यह बताये? वो सब करना पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा जहाँ हर बात यही से शुरू होकर यही ख़तम होती है| कभी मुश्किल में पुरुष से कह कर देखिये, आपको सहायता ही मिलेगी, यह मेरा निजी अनुभव है|

 मेन्स्ट्रुअल मैन-

पैडमैन नाम की यह फिल्म आपको बताएगी कि कैसे माहवारी, महामारी है और इससे बड़ी समस्या भारतवर्षे, आर्यावर्ते, जम्बुद्वीपे में हो ही नहीं सकती| यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगुनाथम नाम के व्यक्ति पर बनी है जिसने सस्ते सेनेटरी नैपकिन बनाने का बीड़ा उठाया| इसके लिए उनको समाज से बहिष्कृत भी किया गया| उनकी पत्नी तक ने उनका साथ छोड़ दिया और अपनी माँ के घर वापिस चली गयी| पर किसी भी कर्मठ पुरुष की तरह अरुणाचलम अपने लक्ष्य तक पहुँच कर माने| और हम स्त्रीयों ने क्या दिया उनको बदले में, वही पुरुष के प्रति घृणा और पुरुष सत्ता को गाली| पुरुषसत्ता जब खुद पर प्रयोग कर के सेनेटरी नैपकिन बनाती है तो अच्छी लगती है मगर वही पुरुष सत्ता जब अपने लिए थोडा सा प्यार और सम्मान चाहती है तो ख़राब लगने लगती है|

जिस तरह ट्विंकल खन्ना पैडमैन फिल्म का प्रचार कर रही हैं उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है| फेमिनिस्म, महिलाओं को किस तरह एहसानफरामोश होना सिखाता है यह भी साफ़ दिखता है| गौरतलब है कि मेन्स्त्रुअल मैंन नाम की एक डाक्यूमेंट्री पहले ही अरुणाचलम पर बन चुकी है, इस  फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ अवश्य की गयी होगी| फिल्म का ट्रेलर देखिये अक्षय कुमार कहते हैं, “ब्लडी मेन अगर आधे घंटे खून बहे तो मर जाये|” यह वो अक्षय कुमार हैं जो आर्मी आर्मी किया करते हैं| सरहद के जवानों की कहानी यह बोलते समय भूल गए| क्योंकि जब इज्ज़त मन में ना हो सिर्फ दिखावा हो तो जुबां फिसल ही जाती है| यही नहीं उन्होंने यह तक कहा कि सेना की सब्सिडी घटाकर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएँ| इससे उनके मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है| कांस्टेबल नितिन BSF का हिस्सा थे, लगातार खून बहते हुए भी गोली चलाते रहे और अंततः शहीद हुए| उनकी वजह से सीमा तोड़कर आने वाले आतंकवादी भाग खड़े हुए| यह केवल एक कहानी है, ज़रा ढूंढ कर देखिये ऐसी सैंकड़ों कहानियां मिल जाएगी हर समाज, हर देश में| पुरुषों की लाशों पर सभ्यताएं बनी हैं और आप सिर्फ एक सेनेटरी नैपकिन वाली फिल्म बेचने के लिए इतनी बेहूदी बात कर रहे हैं ? मैं फेमिनिज्म को बढ़िया आन्दोलन मान लेती अगर इस एक लाइन को हटाने के लिए महिलाएं आन्दोलन कर देती कि हमारे पुरुष ऐसे नहीं हैं| पूरा ट्रेलर देखंगे तो पायेंगे कि औरत हर जगह रो रही है, जैसे महिलाएं ही बीमार होती हैं बस पुरुष को कोई बीमारी पकड़ती ही नहीं|

कैंसर में भी केवल स्तन कैंसर की चर्चा होती है जबकि प्रोस्टेट कैंसर उससे कहीं ज्यादा होता है और पुरुष शर्म से बता भी नहीं पाते| लेकिन नहीं प्रचार तो यह है कि शर्म, लाज केवल महिला के लिए है पुरुष निरा लम्पट निर्लज्ज है| सिगरेट पर पैसे खर्च करता है मगर सेनेटरी नैपकिन पर नहीं, वाह लॉजिक! पुरुष घर खर्च के लिए पैसे देता है तो उसमे कितना झोल झाल करती हैं महिलाएं इसका कोई अंदाज़ा है क्या? मगर आप यह कह भी नहीं सकते क्योंकि महिला गँगा की भांति पवित्र होती है और पुरुष दानव| औरत खुद अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाई इसमें पुरुष समाज क्या करे? पुरुष ने हर तरह की सुविधाएँ दे डाली मगर फिर भी महिला पुरुष को दोष देती घूम रही है| ट्विंकल खन्ना, सोनम कपूर और अक्षय कुमार को इस तरह की वाहियात बात करते कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको एक फिल्म बेचनी है| फुल्लू नाम की फिल्म इसी विषय पर आई थी, उसमे भी यह लाइन थी, “जो औरत का दर्द नहीं समझता उसको भगवन मर्द नहीं समझता|” आप समझते रहिये औरत का दर्द, बदले में वही औरत आपके खिलाफ नफरत फैलाती रहेगी|

फेमिनिस्म के नाम पर साबुन, तेल, शैम्पू, सब बिक रहा है आपकी यह पैडमैन फिल्म भी बिक जाएगी, रह जायेगा तो सवाल क्या पुरुष को कठघरे में खड़ा करना ज़रूरी था, क्या सेना के जवानों के खून का अपमान ज़रूरी था?

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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और जब वीर सावरकरजी ने कहं था भारत इजराएल का समर्थन करे तब…

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वीर विनायक दामोदर सावरकर जो हिंदू राष्ट्रवाद एवं हिंदूत्व के एक प्रभावशाली विचारक थे उन्होने कहा था के मुस्लीम एवं इसाई, जो भारत में जन्में है, वे कभी खाए नमक को नही जागेंगे क्योंकी यह उनकी पवित्र भुमी नही है । उन्होने रोहिंग्या मुस्लीम, पाकिस्तान, नक्षलवादी तथा अनेकों अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार प्रकट किए थे, जो तत्कालीन सरकारने नही माने परंतु आज स्वतंत्रता के ६८ सालों बाद भारत सरकार उन्ही के कहे मार्ग पर चलने हेतु विवश है ।
भारत ने आज तक अनेको बार पॅलेस्टाइन का साथ दिया और आज पॅलेस्टाइन इस्लामीक राष्ट्रों के समर्थन पे सिर्फ खुदको बचाने की कोशिष कर रहा है और काश्मीर को पाकिस्तान का अंग मानता है । और वही इजराएल जीसे भारत ने साथ नही दिया उसी इजराएल ने भारत को १९६२, १९७५ तथा १९९९ के चीन तथा पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में भारत को मदद कि । यही इजराएल भारत कि पाकिस्तान-बांग्लादेश सीमा पर रक्षा हेतु आधुनिक तकनीक प्रदान कर रहा है । यही इजराएल भारत को ड्रोन प्रदान कर रहा है । यही इजराएल भारत को खेती का आधुनिक तंत्रज्ञान, समंदर के पानी को पीने लायक बनाने कि तकनीक दे रहा है ?

पॅलेस्टाइन का समर्थन देकर भारत सरकार ने क्या पा लिया? पॅलेस्टाइन खुले तौर पर पाकिस्तान को काश्मिर मुद्दे पर समर्थन देता रहा है और इजराएल ने भारत को सदैव मदद कि है । यह सब चीजे वीर सावरकरजी को १९४७ में पता थी और भारत सरकारने उन्हें प्रताडीत किया । वे स्वातंत्रयोद्धा थे और काँग्रेस ने उन्हे जेल स्वतंत्र भारत में डाल दिया ।

वीर सावरकर ने कहां था के एक दिन आएगा जब हिंदूत्व के मुद्दो पर मतदान होगा, और उस समय काँग्रेसी नेता कोट के उपर जनेऊ पहनेंगे । गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान काँग्रेस के नेता इस चीज पर बहस करते सुनाई दिए कि राहुल गांधी जो की काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष है वे एक ‘‘जनेऊधारी हिंदू’’ है । स्वयं राहुल गांधी अनेको मंदिरों के दौरे करते हुए पाए गए । यहा तक के उत्तर प्रदेश कि एक रॅली में उन्होने स्वयं ‘‘ब्राह्मण’’ होने का दावा किया था ।

इन सब चीजो के पश्चात जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, राहुल गांधी इन सभी काँग्रेसी नेताओं का आचरण एक ब्राह्मण्य के अनुसार नही था । जवाहरलाल नेहरू को विदेशी संस्कृती का प्रचंड आकर्षण था । इंदिरा गांधी स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष कहती थी । राहुल गांधी ने अमेरिका के राजदुत को यहां तक कह दिया था के भारत को मुस्लीम नही हिंदू लोगों से धोका है । आज वही काँग्रेस स्वयं को हिंदु हिंतैशी प्रस्तुत कर रही है । यही चीज वीर सावरकरजी ने सालों पहले भाँप ली थी ।

हिंदूत्व के जनक वीर वि.दा. सावरकर जी ने भारतीय सरकार को आवाहन किया था के वे संयुक्त राष्ट्रसंघ में इजराएल के निर्मीती के समर्थन में मतदान करे । परंतु तत्कालीन भारत सरकार ने कुछ और सहीं समझा । वीर सावरकर एक अत्यंत प्रखर विचारों के नेता थे, उनकी सोच बहुत दुर तक फैली थी । वे भविष्य कि एक अलग समझ रखते थे । उन्होने बताई हुई अनेक भविष्यवाणीयां सच हुई है । उन्होने इजराएल, रोहिंग्या मुस्लीम, पाकिस्तान, नक्षलवादी तथा अनेकों अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार प्रकट किए थे, जो तत्कालीन सरकारने नही माने परंतु आज स्वतंत्रता के ६८ सालों बाद भारत सरकार उन्ही के कहे मार्ग पर चलने हेतु विवश है ।

भारत सरकार को सच्चा दोस्त किसे हा जाए यह जानने में ६८ वर्ष लग गए, परंतु यह दोस्ती का बीज वीर सावरकरजी ने १९४७ में ही भाँप लिया था । आज ६८ वर्षो के पश्चात भारत के प्रधानमंत्री बेहिचक इजराएल गए और उनका स्वागत भी इजराएल ने उसी अंदाज में किया । ६८ वर्षे पश्चात भारत ने इजराएल को अपने सच्चे दोस्त के रूप में गले लगाया ।

ऐसे एक ना अनेक मुद्दो पें वीर सावरकरजी खरें उतरें है । उन्होंने अंतराल विज्ञान, परमाणु विज्ञान तथा अर्थशास्त्र ऐसे अनेक मुद्दो पे जो विचार व्यक्त किए है वह आज भी अनेक लोगों को अचंभीत कर देते है । अगर समय रहते भारत अपने इस वीर सपूत कि महानता का विश्वास करना सिख ले तो आने वाली भारत कि पिढीयां एक सुदृढ एवं शक्तीशाली हिंदू राष्ट्र का निर्माण कर पाएगी और तभी ‘‘वसुधैव कुढुंबकम्’’ का नारा पूर्ण होगा ।

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सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के सामाजिक एवं आर्थिक निहितार्थ

Manushi Chhillar

तो मानुषी छिल्लर को मिल गया ताज और आप लहालोट हो उछलने लगे। छिल्लर ने कह दिया कि मां को मातृत्व और उसकी ममता का मूल्य सैलरी में मिलना चाहिए और आपको यह बड़ी अच्छी बात लगी। कसम से आपकी क्यूटनेस को नमन रहेगा।

अब जरा पिछले पंद्रह दिनों के घटनाओं पर नजर डालिए। मूडीस(टाम मूडी नहीं)भारत की रेटिंग को Baa3 से Baa2 करता है। ईज आफ बिजनेस डूइंग की रैंक में भारत सौ देशों की श्रेणी में आ जाता है और तभी छिल्लर विश्व सुन्दरी बन जाती हैं।

कई वर्ष पहले भारत सुन्दरी इन्द्राणी रहमान ने विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता के दौरान स्वीमिंग सूट पहनने से इनकार कर दिया था। परिणामतः इन्द्राणी रहमान विश्व सुन्दरी प्रतियोगिता के दौर से बाहर कर दी गयीं।

हमारी संस्कृति में सौदर्य बोध के साथ गहरे पवित्रता का भाव जुड़ा है। दीदारगंज की यक्षी का मूर्ति शिल्प हो या मोनालिसा की मुस्कान का चित्र, दोनों ही स्त्री-सौन्दर्य के उच्चतम प्रतिमान हैं। सौन्दर्य के प्रतिमानों के साथ पवित्रता का रिश्ता जुड़ा है प्रतियोगिता का नहीं।

मानव का आदिम चित्त भेद नहीं करता है। कुरूपता एवं सौन्दर्य में कोई विभाजक रेखा नहीं खींचता है परन्तु आज का मानव चित्त जिसे कुरूप कहता है, आदिम चित्त उसे भी प्रेम करता था। आज हमने विभाजक रेखा खींच कर एक ऐसी बड़ी गलती की है जिसके चलते हम कुरूप को प्रेम नहीं कर पाते क्योंकि वह सुन्दर नहीं, दूसरी ओर हम जिसे सुन्दर समझते हैं, वह दो दिन बाद सुन्दर नहीं रह जाता है। परिचय से, परिचित होते ही सौन्दर्य का जो अपरिचित रस था, वह खो जाता है। सौन्दर्य का जो अपरिचित आकर्षण या आमंत्रण है, वह विलीन हो जाता है। इसी सौन्दर्य को विलीन होने से बचाने के लिए हमने मेकअप की शुरूआत की। मेकअप ओर मेकअप की पूरी धारणा बुनियादी रूप से पाखंड है क्योंकि स्वाभाविक सुन्दरता को किसी बनावट की जरूरत नहीं होती। फिर भी मेकअप का सामान बनाने वाली विश्व की दो बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनियां ‘यूनीलिवर’ एवं ‘रेवलाॅन/प्राक्टर एं गैम्बिल’, ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस वल्र्ड’ नामक सौन्दर्य के विश्वव्यापी उत्सव करती है। इन प्रतियोगिताओं की राजनीति समझने की जरूरत है।

कुछ घटनाओं पर सिलसिलेवार नजर डालें

१)सोवियत संघ के विघटन के तुरन्त बाद रूस की एक लड़की को विश्व सुन्दरी के खिताब से नवाजा गया।

२)1992-93 में जमैका ने जब उदारीकरण की घोषणा की तो उसी वर्ष जमैका की लिमहाना को विश्व सुन्दरी घोषित कर दिया गया।

३)बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को व्यापार की छूट देने के साथ ही वेनेजुएला को 1970 से आज तक ‘मिस वल्र्ड’, ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस फोटोजेनिक’ के तीस से अधिक खिलाब मिल चुके हैं।

४)दक्षिण अफ्रीका की स्वाधीनता के बाद राष्ट्रपति नेल्सन मंडेला द्वारा बहुराष्ट्रीय कम्पनियों को आमंत्रण देने के पुरस्कार स्वरूप वास्तसाने जूलिया को ‘रनर विश्व सुन्दरी’ बनाया गया।

५(विश्व बैंक और अन्तरराष्ट्र्रीय मुद्राकोष के निर्देशों के तहत ढांचागत समायोजन का कार्यक्रम संचालित कर रहे क्रोएशिया और जिम्बाव्वे की लड़कियों को भी चौथा और पांचवा स्थान इन विश्वव्यापी सौन्दर्य उत्सवों में मिला।

६)1966 में जब इन्दिरा गांधी के रुपये का 33 फीसदी अवमूल्यन किया तो उसी वर्ष भारत की रीता फारिया विश्व सुन्दरी बन बैठी।

७)मनमोहन सिंह द्वारा उदारीकरण और वैश्वीकरण की दिशा में चलाये जा रहे ढांचागत समायोजन के कार्यक्रमों का परिणाम हुआ कि 27 वर्ष बाद भारत के खाते में ‘मिस यूनिवर्स’ और ‘मिस वल्र्ड’ दोनों खिताब दर्ज हो गये। फिर भी 97 मंे मुरादाबाद की डायना हेन ‘मिस वलर््ड’ के ताज की हकदार हो गयीं।

८)सौन्दर्य प्रसाधन बनाने वाली ‘रेवलाॅन’ ‘लैक्मे’ और ‘यूनीलीवर’ कम्पनियां विजेताओं को वर्ष भर खास किस्म के कब्जे में रखती हैं। वे कहां जायेंगी ? क्या बोलेंगीं ? क्या पहनेंगी ? सभी कुछ वर्ष भर तक ये प्रायोजित कम्पनियां ही तय करती हैं।

९)1966 में विश्व सुन्दरी खिताब प्राप्त भारत की रीता फारिया को अमरीका-वियतनाम युद्ध के समय प्रायोजित कम्पनी में अमरीकी सैनिकों का मनोरंजन करने के लिए वियतनाम भेजा था।

१०)ये कम्पनियां यह बेहतर ढंग से समती हैं कि विवाहित स्त्री का सौन्दर्य परोसने योग्य नहीं होता है इसलिए विजेताओं पर यह कठोर प्रतिबन्ध होता है कि ये वर्ष भर विवाह नहीं कर सकती हैं।

उत्पाद बनने के लिये स्वतः तैयार नारी देह के सौन्दर्य अर्थशास्त्र का विस्तार इन विश्वव्यापी उत्सवों से निकलकर हमारे देश के गली, मुहे, शहरों, विद्यालय और विश्वविद्यालयों तक पांव पसार चुका है।

भूमंलीकरण और भौतिकवाद के इस काल में स्त्री देह का उत्पाद या विज्ञापन बन जाना, उस नजरिये का विस्तार है, जिसमें स्त्री अपने लिये खुद बाजार तलाश रही है। विद्रूप बाजार में येन-के न-प्रकारेण अपना स्थान बना लेना चाहती है। उसे अपने स्थान बनाने की ‘अवसर लागत’ नहीं पता है। वह कहती है कि उसे यह तय करने का समय नहीं मिल पा रहा है कि किन-किन कीमतों पर क्या-क्या वह अर्जित कर रही है ?

‘फायर’ का प्रदर्शन वह अपने दमित इच्छाओं का विस्तार स्वीकारती है जिसके सामने पहले प्रेम निरुद्ध फिर विवाह के बाद प्रेम की वर्जना थी और अब ‘इस्टेंट लव’ के फैशन की खास और खुली स्वीकृति।

पश्चिम के लिए विकृतियां ही सुखद प्रतीत होती है क्योंकि उनके लिए जीवन का सौन्दर्य अपरिचित हैं। भारत की अस्मिता और गरिमा भी इसलिये रही क्योंकि हमने अभ्यान्तर सौन्दर्य एवं शुद्धता को उसके पूरे विज्ञान को विकसित किया है।

हमारा सौन्दर्य सत्यम्-शिवम्-सुन्दरम् है। हमारा सत्यम् अनुभव है, शिवम् है – कृत्य, वह कृत्य जो इस अनुभव से निकलता है और सौन्दर्य है उस व्यक्ति की चेतना का खिलना जिसने सत्य का अनुभव कर लिया है। मांग और पूर्ति के अर्थशास्त्रीय सिद्धान्त बाजारवादी अर्थव्यवस्था में वस्तुओं/ उत्पादों का मूल्य तय करते हैं। स्त्री देह के प्रदर्शन, उपलब्धता की पूर्ति का विस्तार मूल्यहीनता के उस ‘वर्ज’ पर खा है जहां मांग के गौण हो जाने का गम्भीर खतरा दिखायी दे रहा है इससे स्त्री सौन्दर्य के उच्चतम प्रतिमान तो खिर ही रहे हैं सौन्दर्य के साथ पवित्रता के रिश्तों में भी दरार चौड़ी होती जा रही है।

ऐश्वर्या राय, सुष्मिता सेन, लारा दत्ता,प्रियंकि चोपड़ा,डायना हेडन कैसे बनती हैं?

लगभग हर बड़े ब्यूटी कॉन्टेस्ट में एक राउंड स्विमिंग सूट या बिकिनी राउंड भी होता है और इस में पहने जाने वाले कपड़े काफी छोटे होते हैं. इस राउंड में भाग लेने वाली मॉडल्स के लिए सबसे बड़ी चिंता यह होती है कि अगर प्रदर्शन के दौरान उनके कपड़े हल्के से भी इधर या उधर खिसक गए तो उनके लिए बहुत अपमानजनक स्थिति हो सकती है और इसी स्थिति से बचने के लिए मॉडल्स बट ग्लू का इस्तेमाल करती है. बट ब्लू एक प्रकार की Gum होती है, जिस की पकड़ काफी मजबूत होती है और इसी की वजह से मॉडल्स बिकिनी राउंड में अपने कपड़े खिसकने से या इधर-उधर होने से बचाती है.

यह एक खतरनाक सत्य है की ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली सभी मॉडल अपने को बढ़-चढ़कर दिखाना चाहती है और इसी ख्वाहिश के लिए यह अपना वजन तेजी से घटाती है. लेकिन अब स्लिम ब्यूटी की जगह यह बात अंडरवेट ब्यूटी तक पहुंच गई है.
अंडरवेट का मतलब होता है सेहत के लिए खतरनाक यानी कि आपका वजन आपके लंबाई के हिसाब से जितना होना चाहिए उससे कहीं ज्यादा कम जो सेहत के लिए बहुत ही खतरनाक चीज है. 1930 के दौर में अमेरिका में एवरेज बीएमआई 20.8 थी, जो वैश्विक स्तर पर हेल्दी रेंज में रखी जाती है जबकि 2010 में अमेरिका में ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली लड़कियों की एवरेज बीएमआई 16.9 थी। इसे अंडरवेट माना जाता है|

पहले माना जाता था की सुंदरता एक पैदाइशी गुण होता है लेकिन अब ब्यूटी कांटेस्ट के बढ़ते चलन ने इसे एक महंगा काम बना दिया है क्योंकि अब कम पैसों में ब्यूटी क्वीन नहीं बना जा सकता. वास्तव में ब्यूटी कॉन्टेस्ट में मॉडल्स के मेकअप के ऊपर लाखों रुपया खर्च होता है जिसमें ड्रेस, मेकअप, हेयर स्टाइलिस्ट, पर्सनल ट्रेनर, कोच, ट्रांसपोर्टेशन तथा ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली फीस इत्यादि होती है, जिनका खर्चा लाखों रुपए तक बैठता है. आमतौर पर यह खर्चा ब्यूटी कॉन्टेस्ट का लेवल और देश के अनुसार अलग अलग हो सकता है.

सौंदर्य प्रतियोगिताएं यूं तो आधुनिक जमाने की उपज है लेकिन इसके कई नियम ऐसे हैं जो कि अपने आप में एक पुरानी सोच और दकियानूसी विचार ही दर्शाते हैं जैसे ब्यूटी कॉन्टेस्ट में हिस्सा लेने वाली किसी भी मॉडल का अविवाहित होना जरूरी है. इसके साथ-साथ यह भी आवश्यक है कि उसने बच्चे को जन्म ना दिया हो. इसके अलावा सौंदर्य प्रतियोगिताओं में मिस टाइटल वाली ज्यादातर प्रतियोगिताओं में एंट्री 25-26 साल तक ही मिलती है।

तैयार रहिए बाहर तक झांकती कालर बोन हड्डियां, लाइपोसक्शन और कास्मेटिक सर्जरी की नई नई दुकानें, माडलिंग की आड़ में मुक्त देह की नुमाइशों, इनफर्टिलिटी, आत्महत्याओं और मानसिक अवसाद से घिरे नवयुवक नवयुवतियां आपका इन्तजार कर रही हैं।

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सीताजी ने किन जानवरों से की है रावण की तुलना?

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आजकल हिन्दुओं में बड़ी चतुराई से रावण का महिमामंडन किया जा रहा है और यह झूठ फैलाया गया है कि रावण ने किसी स्त्री का स्पर्श नहीं किया था, उसमें वासना थी तो संयम भी था, आदि आदि जिससे रावण को चरित्रवान साबित किया जा सके और लोगों को श्रीराम से दूर करके राक्षस रावण के समीप ले जाया जा सके। पर वास्तव में यह पूरी तरह झूठ है!!

श्रीराम के जीवन का सबसे प्रमाणिक ग्रन्थ है वाल्मीकि रामायण जो कि श्रीराम के समकालीन ऋषि वाल्मीकि द्वारा रचित है, श्रीराम के जीवन पर यही सबसे प्राचीन ग्रन्थ है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार रावण एक बहुत ही दुष्ट राक्षस था जो कि सभी अवगुणों की खान था, वह यज्ञों में मांस फिंकवाता था, ऋषियों की हत्याएं कराता था, स्त्रियों का बलात्कार जैसा जघन्यतम कर्म करता था। वाल्मीकि रामायण के अनुसार वह कतई भी चरित्रवान नहीं था। उसके पापों, वहशीपन और अधर्म के कारण वाल्मीकि रामायण में सभी ने रावण की कड़े शब्दों में निंदा की है। सीताजी ने रावण की अनेक बुरे जानवरों से तुलना की है और उसे उन जानवरों के समान कहा है :-

1. कुत्ता 
सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 5.21.31
कुत्ता एक वफादार व पालतू पशु है पर वह एक दम्भी पशु है जो अपनी औकात से बाहर के कामों को करने में रुचि लेता है। इसलिए अपमानसूचक शब्दों में हमेशा “कुत्ता” सम्बोधन प्रधान रहा है। रावण भी अपनी हैसियत से बाहर, श्रीविष्णु की लक्ष्मी का हरण करने चला था। इसलिए कहा गया है, “कभी तो कुत्ता भी शेर बनने लगता है”। रावण भी इसी लिए कुत्ते के समान कहा गया है।

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2. सियार
सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.45
सियार एक धूर्त जानवर है। कपटी, धोखेबाज और दुष्ट को धूर्त कहा जाता है। इसके लिए सबसे बड़ी मिसाल धूर्त सियार की दी जाती है। ‘रंगा सियार’ कहावत भी प्रसिद्ध है। सीताजी का धोखे से अपहरण करने वाला रावण भी इसीलिए सियार के समान धूर्त कहा गया है।

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3. बिल्ली
सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.45
बिल्ली एक डरपोक जानवर है। शूद्रता के लिए बिल्ली का उदाहरण दिया जाता है। जैसे वह तो बिल्ली की तरह दुम दबाकर भाग गया। रावण भी अंत तक मारीच, मेघनाद, कुम्भकर्ण की आड़ में छुपता बचता रहा। इसलिए उसे बिल्ली के समान कहा है।

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4. कौआ
सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.46
कौआ एक कर्कश, ढीठ व अपशकुनी पक्षी है। यह सभी को वाणी से कष्ट देता है। रावण भी ऐसा ही अप्रिय भाषण करने वाला क्रूरकर्मा था। वह भी एकदम कौए की तरह काला था, रूप से भी कर्म से भी। इसलिए उसे कौए के समान कहा गया है।

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5. मद्गु (सांप की जाति)
सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.47
सांप एक जहरीला व सबको भयभीत व आतंकित करने वाला प्राणी है। सभी को यह अप्रिय होता है। मद्गु एक छोटा सा शुद्र जलपक्षी भी होता है। रावण भी ऐसा ही जहरीला व सबको आतंकित करने वाला आतंकवादी था। इसलिए उसकी तुलना मद्गु से की गई है।

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6. गिद्ध
सन्दर्भ : वाल्मीकि रामायण 3.47.47
गिद्ध एक बहुत ही अमंगलकारी पक्षी है। यह मृत जीवों के मांस पर पलता है और हिंसक होता है। एक तरह से यह मृत्यु यानी शोक और अमर्ष का प्रतीक है। रावण भी ऐसा ही अमंगलकारी, ऋषियों तक की हत्या करने वाला, व मानव मांसभक्षी था। इसलिए उसकी तुलना गिद्ध से की गई है।

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सीताजी ने बहुत ही बुद्धिमत्तापूर्वक दुष्ट राक्षस रावण के लिए पशुओं की उपमाएं चयनित की हैं। भगवती सीता पराम्बा को बारम्बार प्रणाम है।

– मुदित मित्तल

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ये क्रिप्टो क्रिश्चियन क्या है?

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ग्रीक भाषा मे क्रिप्टो शब्द का अर्थ हुआ छुपा हुआ या गुप्त। क्रिप्टो-क्रिश्चियन* का अर्थ हुआ गुप्त-ईसाई। इसमें महत्वपूर्ण बात ये है कि क्रिप्टो-क्रिश्चियन कोई गाली या नकारात्मक शब्द नहीं हैं। क्रिप्टो-क्रिश्चियनिटी ईसाई धर्म की एक संस्थागत प्रैक्टिस है। क्रिप्टो-क्रिश्चियनिटी के मूल सिद्धांत के अंर्तगत क्रिश्चियन जिस देश मे रहतें है वहाँ वे दिखावे के तौर पर तो उस देश के ईश्वर की पूजा करते हैं, वहाँ का धर्म मानतें हैं जो कि उनका छद्मावरण होता है; पर वास्तव में अंदर से वे ईसाई होते हैं और निरंतर ईसाई धर्म का प्रचार करते रहतें है।

क्रिप्टो-क्रिश्चियन का सबसे पहला उदाहरण रोमन सामाज्य में मिलता है जब ईसाईयत ने शुरुवाती दौर में रोम में अपने पैर रखे थे। तत्काल महान रोमन सम्राट ट्रॉजन ने ईसाईयत को रोमन संस्कृति के लिए खतरा समझा और जितने रोमन ईसाई बने थे उनके सामने प्रस्ताव रखा कि या तो वे ईसाईयत छोड़ें या मृत्यु-दंड भुगतें। रोमन ईसाईयों ने मृत्यु-दंड से बचने के लिए ईसाई धर्म छोड़ने का नाटक किया और उसके बाद ऊपर से वे रोमन देवी देवताओं की पूजा करते रहे, पर अंदर से ईसाईयत को मानते थे। जिस तरह मुसलमान 5-10 प्रतिशत होते हैं होतें है तब उस देश के कानून को मनाते हैं। पर जब 20-30 प्रतिशत होतें हैं तब शरीअत की मांग शुरू होती है, दंगे होतें है। आबादी और अधिके बढ़ने पर गैर-मुसलमानों की Ethnic Cleansing शुरू हो जाती है।

पर, क्रिप्टो-क्रिश्चियन, मुसलमानों जैसी हिंसा नहीं करते। जब क्रिप्टो-क्रिश्चियन 1 प्रतिशत से कम होते है तब वह उस देश के ईश्वर को अपना कर अपना काम करते रहतें है जैसा कि और जब अधिक संख्या में हो जातें तो उन्ही देवी-देवताओं का अपमान करने लगतें हैं। Hollywood की मशहूर फिल्म Agora(2009)** हर हिन्दू को देखनी चाहिए। इसमें दिखाया है कि जब क्रिप्टो-क्रिश्चियन रोम में संख्या में अधिक हुए तब उन्होंने रोमन देवी-देवताओं का अपमान करना शुरू कर दिया। वर्तमान में भारत मे भी क्रिप्टो-क्रिश्चियन ने पकड़ बनानी शुरू की तो यहाँ भी हिन्दू देवी-देवताओं, ब्राह्मणों को गाली देने का काम शुरू कर दिया। मतलब, जो काम यूरोप में 2000 साल पहले हुआ वह भारत मे आज हो रहा है। हाल में प्रोफेसर केदार मंडल द्वारा देवी दुर्गा को वेश्या कहा जो कि दूसरी सदी के रोम की याद दिलाता है।

क्रिप्टो-क्रिश्चियन के बहुत से उदाहरण हैं पर सबसे रोचक उदाहरण जापान से है। मिशनिरियों का तथाकथित-संत ज़ेवियर जो भारत आया था वह 1550 में धर्मान्तरण के लिए जापान गया और उसने कई बौद्धों को ईसाई बनाया। 1643 में जापान के राष्ट्रवादी राजा शोगुन (Shogun) ने ईसाई धर्म का प्रचार जापान की सामाजिक एकता के लिए खतरा समझा। शोगुन ने बल का प्रयोग किया और कई चर्चो को तोड़ा गया। जीसस-मैरी की मूर्तियां जब्त करके तोड़ दी गईं। बाईबल समेत ईसाई धर्म की कई किताबें खुलेआम जलायीं गईं। जितने जापानियों ने ईसाई धर्म अपना लिया था उनको प्रताड़ित किया गया। उनकी बलपूर्वक बुद्ध धर्म मे घर वापसी कराई गई। जिन्होंने मना किया, उनके सर काट दिए गए। कई ईसाईयों ने बौद्ध धर्म मे घर वापसी का नाटक किया और क्रिप्टो-क्रिश्चियन बने रहे। जापान में इन क्रिप्टो-क्रिश्चियन को “काकूरे-क्रिश्चियन***” कहा गया।

काकूरे-क्रिश्चियन ने बौद्धों के डर से ईसाई धर्म से संबधित कोई भी किताब रखनी बन्द कर दी। जीसस और मैरी की पूजा करने के लिए इन्होंने प्रार्थना बनायी जो सुनने में बौद्ध मंत्र लगती पर इसमें बाइबल के शब्द होते थे। ये ईसाई प्रार्थनाएँ काकूरे-क्रिश्चियनों ने एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी मौखिक रूप से हस्तांतरित करनी शुरू कर दी। 1550 से ले कर अगले 400 सालों तक काकूरे-क्रिश्चियन बौद्ध धर्म के छद्मावरण में रहे। 20वीं शताब्दी में जब जापान औद्योगिकीकरण की तरफ बढ़ा और बौद्धों के धार्मिक कट्टरवाद में कमी आई तो इन काकूरे-क्रिश्चियन बौद्ध धर्म के मुखौटे से बाहर निकल अपनी ईसाई पहचान उजागर की।

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बुद्ध के जैसी दिखने वाली मूर्ति, जो वास्तव में मदर मैरी की है, इसे जापान के क्रिप्टो-क्रिश्चियन पूजते थे।

केवल रोमन साम्राज्य और जापान में ही क्रिप्टो क्रिश्चियनों के उदाहरण नहीं मिलते बल्कि बालकंस व एशिया माइनर, मध्यपूर्व, सोवियत रशिया, चाइना, नाज़ी जर्मनी समेत भारत में भी क्रिप्टो क्रिश्चियनों की बहुतायत है। जैसे जापान के क्रिप्टो क्रिश्चियन काकूरे कहलाते हैं वैसे ही एशिया माइनर के देशों सर्बिया में द्रोवर्तस्वो, साइप्रस में पत्सलोई, अल्बानिया में लारामनोई, लेबनान में क्रिप्टो मरोनाईट व इजिप्ट में क्रिप्टो कोप्ट्स कहलाते हैं।

भारत मे ऐसे बहुत से काकूरे-क्रिश्चियन हैं जो सेक्युलरवाद, वामपंथ और बौद्ध धर्म का मुखौटा पहन कर हमारे बीच हैं। भारत मे ईसाई आबादी आधिकारिक रूप से 2 करोड़ है और अचंभे की बात नहीं होगी अगर भारत मे 10 करोड़ ईसाई निकलें। अकेले पंजाब में अनुमानित ईसाई आबादी 10 प्रतिशत से ऊपर है। पंजाब के कई ईसाई, सिख धर्म के छद्मावरण में है, पगड़ी पहनतें है, दाड़ी, कृपाण, कड़ा भी पहनतें हैं पर सिख धर्म को मानते हैं पर ये सभी गुप्त-ईसाई हैं।

बहुत से क्रिप्टो-क्रिश्चियन आरक्षण लेने के लिए हिन्दू नाम रखे हैं। इनमें कइयों के नाम राम, कृष्ण, शिव, दुर्गा आदि भगवानों पर होते हैं। जिन्हें संघ के लोग भी सपने में गैर-हिन्दू नहीं समझ सकते जैसे कि पूर्व राष्ट्रपति के आर नारायणन। जो जिंदगी भर दलित बन के मलाई खाता रहा और जब मरने पर ईसाई धर्म के अनुसार दफनाने की प्रक्रिया देखी तो समझ मे आया कि ये क्रिप्टो-क्रिश्चियन है। देश मे ऐसे बहुत से क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं जो हिन्दू नामों में हिन्दू धर्म पर हमला करके सिर्फ वेटिकन का एजेंडा बढ़ा रहें हैं।

हम रोजमर्रा की ज़िंदगी मे हर दिन क्रिप्टो-क्रिश्चियनों को देखते हैं पर उन्हें समझ नहीं पाते क्योंकि वे हिन्दू नामों के छद्मावरण में छुपे रहतें हैं। जैसे कि–

  • श्री राम को काल्पनिक बताने वाली कांग्रेसी नेता अम्बिका सोनी क्रिप्टो-क्रिश्चियन है।
  • NDTV का अधिकतर स्टाफ क्रिप्टो-क्रिश्चियन है।
  • हिन्दू नामों वाले नक्सली जिन्होंने स्वामी लक्ष्मणानन्द को मारा, वे क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • गौरी लंकेश, जो ब्राह्मणों को केरला से बाहर उठा कर फेंकने का चित्र अपनी फेसबुक प्रोफाइल पर लगाए थी, क्रिप्टो-क्रिश्चियन थी।
  • JNU में भारत के टुकड़े करने के नारे लगाने वाले और फिर उनके ऊपर भारत सरकार द्वारा कार्यवाही को ब्राह्मणवादी अत्याचार बताने वाले वामी नहीं, क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • फेसबुक पर ब्राह्मणों को गाली देने वाले, हनुमान को बंदर, गणेश को हाथी बताने वाले खालिस्तानी सिख, क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • तमिलनाडु में द्रविड़ियन पहचान में छुप कर उत्तर भारतीयों पर हमला करने वाले क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • जिस राज्य ने सबसे अधिक हिंदी गायक दिए उस राज्य बंगाल में हिंदी का विरोध करने वाले क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • अंधश्रद्धा के नाम हिन्दू त्योहारों के खिलाफ एजेंडे चलाने वाला और बकरीद पर निर्दोष जानवरों की बलि और ईस्टर के दिन मरा हुआ आदमी जीसस जिंदा होने को अंधश्रध्दा न बोलने वाला नरेन्द्र दाभोलकर, क्रिप्टो-क्रिश्चियन था।
  • देवी दुर्गा को वैश्या बोलने वाला केदार मंडल और रात दिन फेसबुक पर ब्राह्मणों के खिलाफ बोलने वाले दिलीप सी मंडल, वामन मेश्राम क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • महिषासुर को अपना पूर्वज बताने वाले जितेंद्र यादव और सुनील जनार्दन यादव जैसे कई यादव सरनेम में छुपे क्रिप्टो-क्रिश्चियन हैं।
  • तमिल अभिनेता विजय एक क्रिप्टो- क्रिस्चियन है, पूरा नाम है जोसफ विजय चंद्रशेखर।
  • आम आदमी पार्टी का नेता आशीष खेतान एक क्रिप्टो-क्रिश्चियन है। इसकी पत्नी का नाम है, क्रिस्टिनिया लीडिया फर्नांडीस और दोनों बच्चे ईसाई हैं।

जब किसी के लिवर में समस्या होती है तो उसकी त्वचा में खुजली, जी मचलाना और आंखों पीलापन आ जाता है पर ये सब सिर्फ symptoms हैं इनकी दवा करने से मूल समस्या हल नहीं होगी। अगर लिवर की समस्या को हल कर लिया तो ये symptoms अपने आप गायब हो जाएंगे।बिना विश्लेषण के देखेंगे तो हिंदुओं के लिए तमाम समस्याएं दिखेंगी वामी, कांग्रेस, खालिस्तानी, नक्सली, दलित आंदोलन, JNU इत्यादि है, पर ये सब समस्याएं symptoms मात्र हैं जिसका मूल है क्रिप्टो-क्रिश्चियन।

श्री संजय मिश्रा, लेखक हिन्दू अधिकार कार्यकर्ता व दलित/खालिस्तानी और अन्य क्रिप्टो क्रिश्चियनों के प्रोपेगेंडा के विरोध में काम करते हैं

सन्दर्भ :-
*       क्रिप्टो क्रिश्चियन
**     Agora(2009)
***   काकूरे-क्रिश्चियन

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क्या सम्बन्ध है हिन्दू विरोधी एजेंडे और फेमिनिज्म में!

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आपने अक्सर देखा होगा फेमिनिस्ट हिन्दू धर्म की परम्पराओं और रीति रिवाज़ों का मज़ाक उड़ाती मिलती हैं। क्या सम्बन्ध है एंटी हिन्दू एजेंडे और फेमिनिस्ट में ? इतना तो अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि फेमिनिस्ट यानि महिलावादियों को फंडिंग विदेशों से आती है। इन विदेशी फंडिंग में सबसे ऊपर हांस ( HANS ) का नाम आता है। हांस भारत में सेण्टर फॉर सोशल रिसर्च ( CSR )नाम के संगठन को सपोर्ट करता है। CSR को रंजना कुमारी चलाती हैं। मेरी रंजना जी से दो बार मुलाकात हुई है बल्कि गर्मागर्म बहस हुई है। उन्होंने बोला था हिन्दू कोई धर्म नहीं है आप लोग नाहक ही परेशान हैं। वामपंथियों का भी यही मानना है इसलिए वामपंथियों और फेमिनिस्ट में इतनी समानता नज़र आती है।
हान्स के बारे में विस्तार से पढ़ें ऊपर से देखने में यह सामाजिक संगठन लगेगा पर असल में इसका मुख्य कार्य दुनिया में ईसाईयत फैलाना है। तो जब फण्ड देने वाला ईसाई बनाने पर तुला हो ,तो हिन्दू कोई धर्म रह ही नहीं जाता इनके लिए। मैंने एक फेमिनिस्ट संगठन का उदाहरण दिया ऐसे कई हैं जो विदेशों में भारतीय महिलाओं की रोती छवि दिखाकर पैसा बटोर रहे हैं।

इसके अलावा और एक एजेंडा है। भारत की शक्ति है परिवार हमारे यहाँ आज भी पीढ़ियां साथ रहती हैं। इस परिवार को तोड़ने से बाज़ारवाद बढ़ता है , कैसे ? एक केस हुआ तो लड़का परिवार से अलग हुआ ताकि परिवार पर कोई आंच ना आये। अब उस एक परिवार के दो टुकड़े हो गए , दो मकान होंगे दो बेड होंगे दो टीवी होंगे , बाजार बढ़ेगा। क्यों लगता है आपको कि फेमिनिस्ट नित नए कानून लाने की वकालत करती है क्योंकि व्यापार चलता रहेगा , पैसा आता रहेगा। इसके लिए वो हर तरह का ज़हर घोलेंगी बदन ढकी हुई महिला को बहनजी कहा जयेगा ताकी वो नंगी घूमे और कहे कि ,”नज़र तेरी ख़राब है बदन मैं ढकूँ ” ! हमारी लड़कियों को फ़र्ज़ी अत्याचार की कहानियां सुनाई जाएँगी। मज़े की बात तो यह है कि जो हमारे यहाँ अत्याचार बताया जाता है वही इस्लामिक देशों में सशक्तिकरण बताया जाता है। जैसे उनका हिजाब उनकी परंपरा है तो हमारा करवाचौथ पितृसत्ता का प्रतीक। बड़ा झोल झाल है बात इतनी साधारण नहीं है जितनी दिखती है।

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पितृपक्ष में क्यों है श्राद्ध का महत्व?

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श्राद्ध पूर्वजों के प्रति सच्ची श्रद्धा का प्रतीक है। पितरों के निमित्त विधिपूर्वक जो कर्म श्रद्धा से किया जाता है उसी को ‘श्राद्ध’ कहते हैं। हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रत्येक शुभ कार्य के प्रारम्भ में माता-पिता, पूर्वजों को नमस्कार या प्रणाम करना हमारा कर्तव्य है हमारे पूर्वजों की वंश परम्परा के कारण ही हम आज यह जीवन देख रहे हैं इस जीवन का आनंद प्राप्त कर रहे हैं। इस धर्म में, ऋषियों ने वर्ष में एक पक्ष को पितृपक्ष का नाम दिया। जिस पक्ष में हम अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं।

सनातन धर्म पूर्वजन्म को मानता है लेकिन साथ साथ ये भी मानता है कि एक न एक दिन मोक्ष की प्राप्ति होती है यदि कर्म अच्छे रहे तो। इसीलिए हिन्दू अपने पितरेश्वरों का श्राद्ध, तर्पण, मुक्ति हेतु विशेष क्रिया संपन्न कर उन्हें अर्ध्य समर्पित करते हैं। मृत्यु और नया जन्म लेने के बीच आत्मा को उसके कर्मफल भोगने पड़ते हैं। और श्राद्ध कर्मों से हम पितरों के अच्छे  कर्मों के फल प्राप्त करने में सहायता करते हैं। ताकि पितरों को अच्छे कर्मों के फलस्वरूप अच्छा जन्म मानव योनि में मिले ।

हर व्यक्ति के तीन पूर्वज पिता, दादा और परदादा क्रम से वसु, रुद्र और आदित्य के समान माने जाते हैं। श्राद्ध के वक़्त ये ही वसु, रुद्र तथा आदित्य सभी पूर्वजों के प्रतिनिधि माने जाते हैं। ठीक ढंग से रीति-रिवाजों के अनुसार कराये गये श्राद्ध-कर्म से तृप्त होकर वे श्राद्ध करने वाले वंशधर को सपरिवार सुख-समृद्धि और स्वास्थ्य का आर्शीवाद देते हैं। श्राद्ध-कर्म में उच्चारित मन्त्रों और आहुतियों को वे अन्य सभी पितरों तक ले जाते हैं।

श्राद्ध तीन प्रकार के होते हैं-

नित्य – यह श्राद्ध के दिनों में मृतक के निधन की तिथि पर किया जाता है।
नैमित्तिक – किसी विशेष पारिवारिक उत्सव, जैसे – पुत्र जन्म पर मृतक को याद कर किया जाता है।
काम्य – यह श्राद्ध किसी विशेष मनौती के लिए कृत्तिका या रोहिणी नक्षत्र में किया जाता है।

कौन कर सकता है श्राद्ध –

सिर्फ बेटे ही श्राद्ध कर सकते है ऐसा नहीं है। शास्त्रों के अनुसार साधारणत: पुत्र ही अपने पूर्वजों का श्राद्ध करते हैं। किन्तु शास्त्रानुसार ऐसा हर व्यक्ति जिसने मृतक की सम्पत्ति विरासत में पायी है और उससे प्रेम और आदर भाव रखता है, उस व्यक्ति का स्नेहवश श्राद्ध कर सकता है। विद्या की विरासत पाने वाला छात्र भी अपने दिवंगत गुरु का श्राद्ध कर सकता है। पुत्र की अनुपस्थिति में पौत्र या प्रपौत्र भी श्राद्ध-कर्म कर सकता है। नि:सन्तान पत्नी को पति द्वारा, पिता द्वारा पुत्र को और बड़े भाई द्वारा छोटे भाई को पिण्ड नहीं दिया जा सकता। किन्तु कम उम्र का ऐसा बच्चा, जिसका उपनयन संस्कार न हुआ हो, पिता को जल देकर नवश्राद्ध कर सकता। शेष कार्य उसकी ओर से कुल पुरोहित करता है।

श्राद्ध कर्म

कितना है श्राद्ध में खर्च –

श्राद्ध श्रद्धा का ही एक रूप है इसमें जो भी आप कर सकते हैं कीजिये। विष्णु पुराण के अनुसार गरीब केवल मोटा अन्न, जंगली साग-पात-फल और न्यूनतम दक्षिणा द्वारा श्राद्ध कर सकता है। वह भी ना हो तो सात या आठ तिल अंजलि में जल के साथ लेकर ब्राह्मण को देना चाहिए। या किसी गाय को दिन भर घास खिला देनी चाहिए। अन्यथा हाथ उठाकर दिक्पालों और सूर्य से याचना करनी चाहिए कि, “हे! प्रभु मैंने हाथ वायु में फैला दिये हैं, मेरे पितर मेरी भक्ति से संतुष्ट हों”। फल इसका भी समान प्राप्त होता है।

विशेष –

आजकल लोगों ने श्राद्ध का मजाक बनाना शुरू कर दिया है। मैं मजाक बनाने वालों से सिर्फ इतना पूछना चाहूंगा कि —
क्या आप अपने पितर जनों जिन्होंने हमें इस संसार में जीवन दिया उन्हें रोज संस्मरण करते हैं? उनका रोज ध्यान करते हैं? जवाब मुझे पता है आपका, ‘नहीं’ ही होगा। इसलिए यदि पूरी साल में कुछ दिन आप अपने पूर्वजों को याद कर लेते हैं तो इसमें इतना हो हल्ला कैसा? क्या यह बुरी बात है? श्राद्ध सूक्ष्म शरीरों के लिए वही काम करते हैं, जो कि जन्म के पूर्व और जन्म के समय के संस्कार स्थूल शरीर के लिए करते हैं। इसलिए शास्त्र पूर्वजन्म के आधार पर ही कर्मकाण्ड में श्राद्धादि कर्म का विधान निर्मित करते हैं।
 मृत्यु भोज और श्राद्ध दोनो में भिन्नताएं है।

 अजेष्ठ त्रिपाठी, लेखक मेलबर्न, ऑस्ट्रेलिया निवासी हैं और हिन्दू धर्म, संस्कृति और इतिहास के गहन जानकार और शोधकर्ता हैं


श्राद्ध का वैज्ञानिक पक्ष आप यहाँ पढ़ सकते हैं – 

आधुनिक विज्ञान से भी सिद्ध है पितर श्राद्ध की वैज्ञानिकता

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Jesus never existed, according to a growing number of scholars

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August seems like an unlikely time to be talking about Christmas, but it’ll be here before you know it so we might as well start the debate early this year.

December is usually the time of year when Christians all over the world start going back to church in droves, preparing for the Christmas mass on the 25th of December.

It has long been a bone of contention for regular church goers who see those other people coming during the holy times of year out of duty, rather than living a life dedicated to the church year round. Sometimes, ya gotta wonder if those people are only showing up to church to show off their daughters and sons in their new Christmas outfits.

But either way, Christmas is not only a time of celebration, but also a time of great controversy. As you may or may not know, there has been an ongoing debate about the existence of Jesus Christ for as long as we can remember now, and it’s no wonder.

I mean, have you read the bible? It seems like a long shot that one person could have lived such a life. So it’s no wonder that so many scholars are continuing to question the existence of the real life Jesus.

While there is a growing body of internet literature supporting the argument for the existence of the man we know as Jesus Christ, most of the information is muddied with atheist non-believers who are just trying to make a point.

The academic and scientific communities are still at odds about the existence of such a man, but there’s no doubt that these stories had to have come from somewhere, based on someone’s life, even loosely.

What’s interesting is that the stories themselves are flawed; for example, it’s widely known that there are entire years of Jesus’ life missing from the bible stories. Perhaps work piled up and there was no one to record those times in the man’s life.

But whatever the reason, it just adds fuel to the fire about whether or not there was an actual man named Jesus Christ.

What’s more, there is also more evidence that has come about over the years to indicate that the bible stories have been heavily misinterpreted and edited for the gain of the Catholic and christian churches.

There are several books that have been researched and published to make the argument against the existence of Jesus in real life, including Zealot by Reza Aslan, Nailed: Ten Christian Myths That Show Jesus Never Existed at All by David Fitzgerald, and How Jesus Became God by Bart Ehrman.

One historian even wrote a 600 page manuscript on the history of Jesus and it provides a lot of compelling arguments that the stories of Jesus are fabricated and manipulated to create new stories of a god-like man.

It shouldn’t seem surprising that man has held onto the belief of a godly figure for so long. After all the Greeks, Romans, Pagans, and other nations believed in celestial gods. Entire civilizations believed that they were ruled by Gods and they obeyed Gods for their protection and knowledge.

How come no one is wondering about the existence of Zeus or Thor? They aren’t just comic book characters you know. People actually believed in these entities.

The conversation of whether or not there was a real man named Jesus that the bible was written about and that millions of people worldwide believe in, has many layers.

There are so many elements to these stories that it is hard not to believe them. Yet, many more millions of people don’t believe in God, Jesus or any other worldly being.

As a society, there seems to be a shift toward believing in the power of the universe or fate or other things beyond our control, and people have no trouble praising the universe for their existence, but when it comes to praising God, Jesus or otherwise, people clam up and there is a level of embarrassment that is present these days.

So while the atheists and the scholars might not think they are making headway to disprove the existence of Jesus, people are taking notice and are holding their beliefs close to their chest.

Perhaps because they, too, question what they think they know, and are finding it difficult to navigate a world in which Jesus is not real.

Source : myscienceacademy.org

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Facebook kills AI that invented its own language because it thought English was slow

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Some wonderful things are in development because of advances made in artificial intelligence and machine learning technologies. At the same time, there is perhaps an uncomfortable fear that machines may rise up and turn against humans. Usually the scenario is brought up in a joking matter, but it was no laughing manner to researchers at Facebook who shut down an AI they invented after it taught itself a new language, Digital Journal reports.

The AI was trained in English but apparently had grown fed up with the various nuances and inconsistencies. Rather than continue down that path, it developed a system of code words to make communication more efficient.

What spooked the researchers is that the phrases used by the AI seemed like gibberish and were unintelligible to them, but made perfect sense to AI agents. This allowed the AI agents to communicate with one another without the researchers knowing what information was being shared.

During one exchange, two bots named Bob and Alice abandoned English grammar rules and started communicating using the made up language. Bob kicked things off by saying, “I can i i everything else,” which prompted Alice to respond, “balls have zero to me to me to me…” The conversation went on in that manner.

The researchers believe the exchange represents more than just a bunch of nonsense, which is what it appears to be on the surface. They note that repeating words and phrases such as “i” and “to me” are indicative of how AI works. In this particular conversation, they believe the bots were discussing how many of each item they should take.

AI technologies use a “reward” system in which they expect of a course of action to have a “benefit.”

“There was no reward to sticking to English language,” Dhruv Batra, a research scientists from Georgia Tech who was at Facebook AI Research (FAIR), told Fast Co. Design. “Agents will drift off understandable language and invent codewords for themselves. Like if I say ‘the’ five times, you interpret that to mean I want five copies of this item. This isn’t so different from the way communities of humans create shorthands.”

Facebook ultimately determined that it wanted its bots to speak in plain English, in part because the interest was in making bots that can talk with people. However, researchers at Facebook also admitted that they can’t truly understand languages invented by AI.

 

The News was published on PCgamer.com

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