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स्टरलाइट टेक भारतीय नौसेना के लिए अगली पीढ़ी का संचार नेटवर्क विकसित करेगी

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गुरूग्राम, भारत, February 27, 2018 /PRNewswire/ —

रू3500-करोड़ का सिस्टम एकीकरण प्रोजेक्ट भारतीय नौसेना को विश्वस्तर पर सबसे आधुनिक नौसैनिक बलों के अनुरूप डिजिटल संचार नेटवर्क से लैस करेगा ।

Sterlite Tech [BSE: 532374, NSE: STRTECH], जो कि वेब-स्केल डिजिटल नेटवर्कों में वैश्विक तकनीकी अग्रणी कंपनी है, को भारतीय नौसेना के संचार नेटवर्क के डिजाइन, निर्माण और प्रबंधन के लिए रू 3500-करोड़ का एडवांस पर्चेज आर्डर मिला है। इससे भारतीय नौसेना को विश्वस्तर पर सर्वोत्तम नौसैनिक बलों के अनुरूप डिजिटल प्रतिरक्षा श्रेष्ठता प्राप्त होगी।

पहली बार भारत में इतने बड़े पैमाने पर एक एकीकृत नौसेना संचार नेटवर्क निर्मित किया जाना है। नौसेना का संचार नेटवर्क बेहतर प्रवाह क्षमता (थ्रूपुट), उच्चकोटि की सुरक्षा सेवाओं, और नेटवर्क के आसान प्रबंधन वाली खूबियों से लैस एक अधिक स्मार्ट नेटवर्क इन्फ्रास्ट्रक्चर होगा। इस करार के तहत Sterlite Tech अपनी सिस्टम एकीकरण क्षमताओं के माध्यम से एक दशक से अधिक समय तक संचार नेटवर्क को डिजाइन, निर्मित और प्रबंधित करेगी।

Dr Anand Agarwal, CEO, Sterlite Tech ने इस संबंध में कहा कि, “उच्चकोटि के व्यापक, भविष्य को ध्यान में रखकर तैयार किए जाने वाले नेटवर्कों के माध्यम से भारत की प्रतिरक्षी क्षमता मजबूत बनाने में भूमिका निभाने का अवसर मिलना हमारे लिए गर्व की बात है।” उन्होंने आगे बताया कि “जम्मू एवं कश्मीर में भारतीय थलसेना के लिए घुसपैठ-रहित संचार नेटवर्क निर्मित करने का हमारा हाल का अनुभव, नौसेना के संचार नेटवर्क के विकास के दौरान हमारे काम आएगा। सॉफ्टवेयर से सिलिकॉन तक की हमारी अद्वितीय क्षमताओं के साथ, भारतीय नौसेना के लिए यह सम्पूर्ण रणनीतिक नेटवर्क उपलब्ध कराने के लिए हम एकदम तैयार हैं।”

परियोजना की विशेषताओं के संबंध में, KS Rao, COO और MD (दूरसंचार उत्पाद एवं सेवाएं), Sterlite Tech, ने कहा कि, “भारतीय प्रतिरक्षा के लिए कार्य करना और इतने व्यापक एकीकृत संचार नेटवर्क को निर्मित करना हमारे लिए गौरव की बात है। मास्टर सिस्टम्स इंटिग्रेटर के रूप में, हम दो लेयर वाली केंद्रीय प्रबंधित IP बैकबोन पर एक कन्वर्ज्ड MPLS इन्फ्रास्ट्रक्चर की योजना और डिजाइन में नेतृत्व करेंगे। यह भारतीय नौसेना को प्रशासनिक और प्रतिरक्षा कार्यों के लिए एक सुरक्षित और विश्वसनीय डिजिटल हाईवे उपलब्ध कराएगा।”

बेजोड़ संभावनाओं तथा आकार वाले इस प्रोजेक्ट में एक उच्च क्षमता वाला IP-MPLS (इंटरनेट प्रोटोकॉल- मल्टी प्रोटोकॉल लेबल स्विचिंग) नेटवर्क निर्मित किया जाना शामिल है। पूरा हो जाने पर यह भारतीय नौसेना की अनेक साइटों और भारतीय प्रशासित द्वीपों को जोड़ेगा।

Sterlite Technologies के बारे में:

Sterlite Technologies Ltd, [BSE: 532374, NSE: STRTECH] वैश्विक तकनीकी अग्रणी कंपनी है जो अधिक स्मार्ट नेटवर्कों को डिजाइन, स्थापना व प्रबंधन करती है। Sterlite Tech 100 से अधिक देशों में विविध उत्पाद, सेवाओं और सॉफ्टवेयर में डिजिटल वेब-स्केल पेशकश करती है। भारत, चीन तथा ब्राजील में कंपनी की अत्याधुनिक उत्पादन इकाइयां स्थित हैं और दो सॉफ्टवेयर डिलीवरी सेंटर भारत में स्थित हैं। अगली पीढ़ी के नेटवर्क अनुप्रयोगों के लिए अधिक स्मार्ट नेटवर्कों के लिए Sterlite Tech का ब्राडबैंड अनुसंधान केंद्र भारत का अपनी तरह का एकमात्र उत्कृष्टता केंद्र है। सशस्त्र बलों के लिए घुसपैठ-रहित स्मार्टर डेटा नेटवर्क, भारतनेट के लिए ग्रामीण ब्राडबैंड, स्मार्ट शहरों का विकास, तथा हाई-स्पीड वाले फाइबर-टू-दि-होम (FTTH) नेटवर्कों की स्थापना, कंपनी को सौंपी गई कुछ प्रमुख परियोजनाएं हैं।

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Gender IssuesHindi

पैडमैन- पुरुष-विरोधी मानसिकता का नंगा नाच

अगर बात सिर्फ सेनेटरी नैपकिन की होती तो कोई बात नहीं थी अगर बात सिर्फ शौचालय बनाने की होती तो भी कोई बात नहीं थी| मगर हर बात में स्वतः ही पुरुष के प्रति घृणा कहाँ से आ जाती है यह समझ से परे है| जब शौचालय पर फिल्म की तब भी आदमी को गाली दी बल्कि शौच करते हुए आदमी की फोटो तक सोशल मीडिया पर डाल दी, आदमी की इज्ज़त होती नहीं ना| हर चीज़ को आदमी के अत्याचार से जोड़ दो शौचालय बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पुरुष शौच करती हुई महिला तक को नहीं छोड़ते हैं| किस प्रकार का लॉजिक है यह ?

मैं उस ज़माने की हूँ जब सेनेटरी नैपकिन भारत में कदम रख रहे थे| यह उस समय की बात है जब केयरफ्री नाम का संभवतःएक ही ब्रांड आता था| वो भी किसी काम का नहीं था विशेषतौर पर मेरी जैसी लडकियों के लिए क्योंकि हम स्कूल जाती थी, साईकल चलाती थी और कबड्डी भी खेलती थी| सेनेटरी नैपकिन नहीं थे तो काम कैसे चलता था ? छोटे गाँव और कस्बों में कपडे की दुकान पर सस्ते सूती कपडे के थान मिलते थे और रूई तो थी ही| मैं ऐसे स्कूल में भी पढ़ी हूँ, जहाँ ढंग का टॉयलेट भी नहीं था| मतलब पैड बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी| मगर मुझे याद नहीं कि मैं या मेरे साथ की किसी लड़की ने कभी इसके लिए पूरी पुरुष जाति को ज़िम्मेदार ठहराया हो| हमने उसमें से रास्ता निकाला और आगे बढ़ते गए| सूती कपडे के साथ-साथ घर के पुराने सूती कपड़ों का भी इस्तेमाल होता था, जिसको फिल्म वाले ओल्ड रग्स यानी चीथड़े बताएँगे| फिर आया मिस यूनिवर्स का दौर जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी| सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय के मिस वर्ल्ड बनने के बाद ताबड़तोड़ कॉस्मेटिक और सेनेटरी नैपकिन के ब्राण्ड भारत में आये| हमारे लिए राहें आसन हुई मगर दुष्प्रचार के साथ कि हम भारत की स्त्रियाँ गन्दगी से मासिक धर्म का निर्वाह करती है, हम बेचारी गरीब और सताई हुई हैं इत्यादि| सेनेटरी नैपकिन बेचने का यह तरीका था और इसके लिए सिस्टेमेटिक ब्रेनवाशिंग की गयी| हम सूती कपडे और रूई इन्स्तेमाल करते थे, इन्होने प्रचार किया कि हम गन्दा कपड़ा और गन्दा कागज़ इस्तेमाल करते हैं|

खैर सेनेटरी नैपकिन चल पड़े बाज़ार में क्योंकि इनकी ज़रुरत भी थी| तरह तरह के प्रचार से इनको बेचा गया छू लो दुनिया, कर लो सब मुट्ठी में जैसे अगर वो 3 दिन रुक गयी तो दुनिया हाथ से निकल जाएगी| ध्यान देने की बात यह है कि menstrual कप, पीरियड पैनटी जैसे अन्य तरीकों का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया| क्योंकि उनको बार- बार खरीदना नहीं पड़ता, बाज़ार आगे कैसे बढेगा|

क्या हम गन्दी चीज़ें प्रयोग करती थी –

व्यक्तिगत साफ़ सफाई सबकी अलग-अलग होती है| कोई रोज़ नहाता है तो कोई हफ्ते में एक बार, कोई कपड़े धोये और प्रेस किया बिना नहीं पहनता तो कोई मुचड़े कपड़ो में प्रसन्न है| कहने का अर्थ यह है कि जो वैसे साफ सुथरी नहीं रहती वो मासिक धर्म के दौरान भी गन्दी ही रहेगी| एक औरत अगर गन्दगी से रहती है तो यह पूरे भारत की स्त्रियों की समस्या नहीं है| मगर ठीक है आपको पैड बेचना है तो कुछ भी कहिये| मज़े की बात यह कि इन् लोगों ने प्रचार किया कि यह लोग बेचारी पैड बनाती, धोती, सुखाती हैं फिर प्रयोग करती है| अब इनसे पूछिए कि पीरियड पैनटी को भी तो धोया जाता है और आजकल रीयूज़ेबल पैड भी आते हें है| वो क्या हें, उनको भी धोया, सुखाया जाता है|

सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स क्यों –

सस्ते नैपकिन खरीदेंगी महिलाये? मेरे मोहल्ले में एक सस्ते लोकल नैपकिन बेचने वाली महिला आई थी जिस से किसी ने भी नहीं खरीदा, पैड में कोई खराबी नहीं थी बस उस पर कोई बड़ा ब्रांड का नाम नहीं था| यहाँ शनेल ब्राण्ड की फर्स्ट कॉपी खरीदने वाली महिला जब सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स की बात करती है तो हंसी आती है| हजारों रुपये ब्रांडेड कास्मेटिक पर लगा देने के बाद सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स याद आया है| सरकार कह रही है कि सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की आवश्यकता होती है वो महँगा है| हर बात पर सरकार और पुरुषों पर दोष मढने वाली महिला को यह बात नहीं समझ आएगी| दोष देने से बेहतर होता रास्ता तलाश करना जिससे कच्चा माल भारत में पैदा हो सके मगर इतनी मेहनत कौन करे दोष देना आसान है| और दोष भी कैसा ज़रा भाषा का चुनाव देखिये –

इनका मानना है कि सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स है वियाग्रा पर नहीं क्योंकि ज़्यादातर नीति बनाने वाले 65 साल के वृद्ध हैं जिनको स्तंभन दोष हो चुका होता है| जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि किसी भी चीज़ को बेचने के लिए यह लोग किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| एक फेमिनिस्ट की सोच वियाग्रा, सेक्स, स्तन, लिंग से आगे नहीं बढ़ पाती| किसी भी विषय पर बात करवा लीजिये यह घूमकर इसी पर आ जायेंगी|

फ्री ब्लीडिंग से सेनेटरी नैपकिन तक –

कुछ साल पहले किरण गाँधी नाम की एक महिला लन्दन में बिना पैड पहने मैराथन दौड़ी थी और उसको बहुत बहादुर मानकर पुरस्कार भी दिया गया था| एक तरफ फेमिनिट्स लोग पुरुष पर सब दोष मढ़कर सेनेटरी नैपकिन का प्रचार करते हैं दूसरी तरफ यह महिला बिना पैड के दौड़ती है| कोई इनसे पूछे सशक्तिकरण का अर्थ यदि आदिम काल में लौटना है जहाँ ना कपड़े हों ना सुविधाएँ तब तो सबको सशक्त करना आसान है| इसको फेमिनिस्ट्स ने फ्री ब्लीडिंग का नाम दिया है| उसने अपना अनुभव बताया था कि कैसे उसको पुरुषों ने टोका कि, “मैडम आपके कपड़ों पर दाग हैं|” यह उनको पितृसत्ता का दमन लगा था| इस प्रकार के तर्क के हिसाब से यदि मैं किसी को टोकूं कि आपके कपड़ों की सिलाई खुली है या दाग है तो उसे मातृसत्ता का दमन माना जाये|

इनके लॉजिक से चलने वाली महिलाएं बहस करती हैं तो कहती हैं कि आप लोग नहीं जानते कितना दर्द है माहवारी और बालक को जन्म देने में| तो पुरुष का दर्द क्या आप समझती हैं ? आप खुद कंफ्यूज है कि करना क्या है फ्री ब्लीडिंग या सेनेटरी नैपकिन|

पीरियड टैबू का ढिंढोरा पीटने वाली महिलाओं से पूछे कोई कि इसको टैबू बनाया किसने? स्वयं महिलाओं ने ही ना, घर के पुरुष को तो पता भी नहीं चलता कि लड़की को माहवारी शुरू हो गयी है| एक और बात कि पीरियड्स के बारे में बात नहीं कर सकते, यह बिलकुल गलत है जहाँ ज़रुरत होती है वहां करते हैं| सड़क चलते पीरियड, सेक्स बात क्यों क्यों ज़रूरी है पहले कोई यह बताये? वो सब करना पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा जहाँ हर बात यही से शुरू होकर यही ख़तम होती है| कभी मुश्किल में पुरुष से कह कर देखिये, आपको सहायता ही मिलेगी, यह मेरा निजी अनुभव है|

 मेन्स्ट्रुअल मैन-

पैडमैन नाम की यह फिल्म आपको बताएगी कि कैसे माहवारी, महामारी है और इससे बड़ी समस्या भारतवर्षे, आर्यावर्ते, जम्बुद्वीपे में हो ही नहीं सकती| यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगुनाथम नाम के व्यक्ति पर बनी है जिसने सस्ते सेनेटरी नैपकिन बनाने का बीड़ा उठाया| इसके लिए उनको समाज से बहिष्कृत भी किया गया| उनकी पत्नी तक ने उनका साथ छोड़ दिया और अपनी माँ के घर वापिस चली गयी| पर किसी भी कर्मठ पुरुष की तरह अरुणाचलम अपने लक्ष्य तक पहुँच कर माने| और हम स्त्रीयों ने क्या दिया उनको बदले में, वही पुरुष के प्रति घृणा और पुरुष सत्ता को गाली| पुरुषसत्ता जब खुद पर प्रयोग कर के सेनेटरी नैपकिन बनाती है तो अच्छी लगती है मगर वही पुरुष सत्ता जब अपने लिए थोडा सा प्यार और सम्मान चाहती है तो ख़राब लगने लगती है|

जिस तरह ट्विंकल खन्ना पैडमैन फिल्म का प्रचार कर रही हैं उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है| फेमिनिस्म, महिलाओं को किस तरह एहसानफरामोश होना सिखाता है यह भी साफ़ दिखता है| गौरतलब है कि मेन्स्त्रुअल मैंन नाम की एक डाक्यूमेंट्री पहले ही अरुणाचलम पर बन चुकी है, इस  फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ अवश्य की गयी होगी| फिल्म का ट्रेलर देखिये अक्षय कुमार कहते हैं, “ब्लडी मेन अगर आधे घंटे खून बहे तो मर जाये|” यह वो अक्षय कुमार हैं जो आर्मी आर्मी किया करते हैं| सरहद के जवानों की कहानी यह बोलते समय भूल गए| क्योंकि जब इज्ज़त मन में ना हो सिर्फ दिखावा हो तो जुबां फिसल ही जाती है| यही नहीं उन्होंने यह तक कहा कि सेना की सब्सिडी घटाकर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएँ| इससे उनके मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है| कांस्टेबल नितिन BSF का हिस्सा थे, लगातार खून बहते हुए भी गोली चलाते रहे और अंततः शहीद हुए| उनकी वजह से सीमा तोड़कर आने वाले आतंकवादी भाग खड़े हुए| यह केवल एक कहानी है, ज़रा ढूंढ कर देखिये ऐसी सैंकड़ों कहानियां मिल जाएगी हर समाज, हर देश में| पुरुषों की लाशों पर सभ्यताएं बनी हैं और आप सिर्फ एक सेनेटरी नैपकिन वाली फिल्म बेचने के लिए इतनी बेहूदी बात कर रहे हैं ? मैं फेमिनिज्म को बढ़िया आन्दोलन मान लेती अगर इस एक लाइन को हटाने के लिए महिलाएं आन्दोलन कर देती कि हमारे पुरुष ऐसे नहीं हैं| पूरा ट्रेलर देखंगे तो पायेंगे कि औरत हर जगह रो रही है, जैसे महिलाएं ही बीमार होती हैं बस पुरुष को कोई बीमारी पकड़ती ही नहीं|

कैंसर में भी केवल स्तन कैंसर की चर्चा होती है जबकि प्रोस्टेट कैंसर उससे कहीं ज्यादा होता है और पुरुष शर्म से बता भी नहीं पाते| लेकिन नहीं प्रचार तो यह है कि शर्म, लाज केवल महिला के लिए है पुरुष निरा लम्पट निर्लज्ज है| सिगरेट पर पैसे खर्च करता है मगर सेनेटरी नैपकिन पर नहीं, वाह लॉजिक! पुरुष घर खर्च के लिए पैसे देता है तो उसमे कितना झोल झाल करती हैं महिलाएं इसका कोई अंदाज़ा है क्या? मगर आप यह कह भी नहीं सकते क्योंकि महिला गँगा की भांति पवित्र होती है और पुरुष दानव| औरत खुद अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाई इसमें पुरुष समाज क्या करे? पुरुष ने हर तरह की सुविधाएँ दे डाली मगर फिर भी महिला पुरुष को दोष देती घूम रही है| ट्विंकल खन्ना, सोनम कपूर और अक्षय कुमार को इस तरह की वाहियात बात करते कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको एक फिल्म बेचनी है| फुल्लू नाम की फिल्म इसी विषय पर आई थी, उसमे भी यह लाइन थी, “जो औरत का दर्द नहीं समझता उसको भगवन मर्द नहीं समझता|” आप समझते रहिये औरत का दर्द, बदले में वही औरत आपके खिलाफ नफरत फैलाती रहेगी|

फेमिनिस्म के नाम पर साबुन, तेल, शैम्पू, सब बिक रहा है आपकी यह पैडमैन फिल्म भी बिक जाएगी, रह जायेगा तो सवाल क्या पुरुष को कठघरे में खड़ा करना ज़रूरी था, क्या सेना के जवानों के खून का अपमान ज़रूरी था?

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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पैडमैन – पुरुष-विरोधी मानसिकता का नंगा नाच

अगर बात सिर्फ सेनेटरी नैपकिन की होती तो कोई बात नहीं थी अगर बात सिर्फ शौचालय बनाने की होती तो भी कोई बात नहीं थी| मगर हर बात में स्वतः ही पुरुष के प्रति घृणा कहाँ से आ जाती है यह समझ से परे है| जब शौचालय पर फिल्म की तब भी आदमी को गाली दी बल्कि शौच करते हुए आदमी की फोटो तक सोशल मीडिया पर डाल दी, आदमी की इज्ज़त होती नहीं ना| हर चीज़ को आदमी के अत्याचार से जोड़ दो शौचालय बनाना चाहिए क्योंकि हमारे पुरुष शौच करती हुई महिला तक को नहीं छोड़ते हैं| किस प्रकार का लॉजिक है यह ?

मैं उस ज़माने की हूँ जब सेनेटरी नैपकिन भारत में कदम रख रहे थे| यह उस समय की बात है जब केयरफ्री नाम का संभवतःएक ही ब्रांड आता था| वो भी किसी काम का नहीं था विशेषतौर पर मेरी जैसी लडकियों के लिए क्योंकि हम स्कूल जाती थी, साईकल चलाती थी और कबड्डी भी खेलती थी| सेनेटरी नैपकिन नहीं थे तो काम कैसे चलता था ? छोटे गाँव और कस्बों में कपडे की दुकान पर सस्ते सूती कपडे के थान मिलते थे और रूई तो थी ही| मैं ऐसे स्कूल में भी पढ़ी हूँ, जहाँ ढंग का टॉयलेट भी नहीं था| मतलब पैड बदलने की कोई व्यवस्था नहीं थी| मगर मुझे याद नहीं कि मैं या मेरे साथ की किसी लड़की ने कभी इसके लिए पूरी पुरुष जाति को ज़िम्मेदार ठहराया हो| हमने उसमें से रास्ता निकाला और आगे बढ़ते गए| सूती कपडे के साथ-साथ घर के पुराने सूती कपड़ों का भी इस्तेमाल होता था, जिसको फिल्म वाले ओल्ड रग्स यानी चीथड़े बताएँगे| फिर आया मिस यूनिवर्स का दौर जब सुष्मिता सेन मिस यूनिवर्स बनी| सुष्मिता सेन के मिस यूनिवर्स और ऐश्वर्या राय के मिस वर्ल्ड बनने के बाद ताबड़तोड़ कॉस्मेटिक और सेनेटरी नैपकिन के ब्राण्ड भारत में आये| हमारे लिए राहें आसन हुई मगर दुष्प्रचार के साथ कि हम भारत की स्त्रियाँ गन्दगी से मासिक धर्म का निर्वाह करती है, हम बेचारी गरीब और सताई हुई हैं इत्यादि| सेनेटरी नैपकिन बेचने का यह तरीका था और इसके लिए सिस्टेमेटिक ब्रेनवाशिंग की गयी| हम सूती कपडे और रूई इन्स्तेमाल करते थे, इन्होने प्रचार किया कि हम गन्दा कपड़ा और गन्दा कागज़ इस्तेमाल करते हैं|

खैर सेनेटरी नैपकिन चल पड़े बाज़ार में क्योंकि इनकी ज़रुरत भी थी| तरह तरह के प्रचार से इनको बेचा गया छू लो दुनिया, कर लो सब मुट्ठी में जैसे अगर वो 3 दिन रुक गयी तो दुनिया हाथ से निकल जाएगी| ध्यान देने की बात यह है कि menstrual कप, पीरियड पैनटी जैसे अन्य तरीकों का ज़्यादा प्रचार नहीं किया गया| क्योंकि उनको बार- बार खरीदना नहीं पड़ता, बाज़ार आगे कैसे बढेगा|

क्या हम गन्दी चीज़ें प्रयोग करती थी –

व्यक्तिगत साफ़ सफाई सबकी अलग-अलग होती है| कोई रोज़ नहाता है तो कोई हफ्ते में एक बार, कोई कपड़े धोये और प्रेस किया बिना नहीं पहनता तो कोई मुचड़े कपड़ो में प्रसन्न है| कहने का अर्थ यह है कि जो वैसे साफ सुथरी नहीं रहती वो मासिक धर्म के दौरान भी गन्दी ही रहेगी| एक औरत अगर गन्दगी से रहती है तो यह पूरे भारत की स्त्रियों की समस्या नहीं है| मगर ठीक है आपको पैड बेचना है तो कुछ भी कहिये| मज़े की बात यह कि इन् लोगों ने प्रचार किया कि यह लोग बेचारी पैड बनाती, धोती, सुखाती हैं फिर प्रयोग करती है| अब इनसे पूछिए कि पीरियड पैनटी को भी तो धोया जाता है और आजकल रीयूज़ेबल पैड भी आते हें है| वो क्या हें, उनको भी धोया, सुखाया जाता है|

सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स क्यों –

सस्ते नैपकिन खरीदेंगी महिलाये? मेरे मोहल्ले में एक सस्ते लोकल नैपकिन बेचने वाली महिला आई थी जिस से किसी ने भी नहीं खरीदा, पैड में कोई खराबी नहीं थी बस उस पर कोई बड़ा ब्रांड का नाम नहीं था| यहाँ शनेल ब्राण्ड की फर्स्ट कॉपी खरीदने वाली महिला जब सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स की बात करती है तो हंसी आती है| हजारों रुपये ब्रांडेड कास्मेटिक पर लगा देने के बाद सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स याद आया है| सरकार कह रही है कि सेनेटरी नैपकिन बनाने के लिए जिस कच्चे माल की आवश्यकता होती है वो महँगा है| हर बात पर सरकार और पुरुषों पर दोष मढने वाली महिला को यह बात नहीं समझ आएगी| दोष देने से बेहतर होता रास्ता तलाश करना जिससे कच्चा माल भारत में पैदा हो सके मगर इतनी मेहनत कौन करे दोष देना आसान है| और दोष भी कैसा ज़रा भाषा का चुनाव देखिये –

इनका मानना है कि सेनेटरी नैपकिन पर टैक्स है वियाग्रा पर नहीं क्योंकि ज़्यादातर नीति बनाने वाले 65 साल के वृद्ध हैं जिनको स्तंभन दोष हो चुका होता है| जैसा कि मैंने आरम्भ में कहा कि किसी भी चीज़ को बेचने के लिए यह लोग किसी भी स्तर तक गिर जाते हैं| एक फेमिनिस्ट की सोच वियाग्रा, सेक्स, स्तन, लिंग से आगे नहीं बढ़ पाती| किसी भी विषय पर बात करवा लीजिये यह घूमकर इसी पर आ जायेंगी|

फ्री ब्लीडिंग से सेनेटरी नैपकिन तक –

कुछ साल पहले किरण गाँधी नाम की एक महिला लन्दन में बिना पैड पहने मैराथन दौड़ी थी और उसको बहुत बहादुर मानकर पुरस्कार भी दिया गया था| एक तरफ फेमिनिट्स लोग पुरुष पर सब दोष मढ़कर सेनेटरी नैपकिन का प्रचार करते हैं दूसरी तरफ यह महिला बिना पैड के दौड़ती है| कोई इनसे पूछे सशक्तिकरण का अर्थ यदि आदिम काल में लौटना है जहाँ ना कपड़े हों ना सुविधाएँ तब तो सबको सशक्त करना आसान है| इसको फेमिनिस्ट्स ने फ्री ब्लीडिंग का नाम दिया है| उसने अपना अनुभव बताया था कि कैसे उसको पुरुषों ने टोका कि, “मैडम आपके कपड़ों पर दाग हैं|” यह उनको पितृसत्ता का दमन लगा था| इस प्रकार के तर्क के हिसाब से यदि मैं किसी को टोकूं कि आपके कपड़ों की सिलाई खुली है या दाग है तो उसे मातृसत्ता का दमन माना जाये|

इनके लॉजिक से चलने वाली महिलाएं बहस करती हैं तो कहती हैं कि आप लोग नहीं जानते कितना दर्द है माहवारी और बालक को जन्म देने में| तो पुरुष का दर्द क्या आप समझती हैं ? आप खुद कंफ्यूज है कि करना क्या है फ्री ब्लीडिंग या सेनेटरी नैपकिन|

पीरियड टैबू का ढिंढोरा पीटने वाली महिलाओं से पूछे कोई कि इसको टैबू बनाया किसने? स्वयं महिलाओं ने ही ना, घर के पुरुष को तो पता भी नहीं चलता कि लड़की को माहवारी शुरू हो गयी है| एक और बात कि पीरियड्स के बारे में बात नहीं कर सकते, यह बिलकुल गलत है जहाँ ज़रुरत होती है वहां करते हैं| सड़क चलते पीरियड, सेक्स बात क्यों क्यों ज़रूरी है पहले कोई यह बताये? वो सब करना पाश्चात्य संस्कृति का हिस्सा जहाँ हर बात यही से शुरू होकर यही ख़तम होती है| कभी मुश्किल में पुरुष से कह कर देखिये, आपको सहायता ही मिलेगी, यह मेरा निजी अनुभव है|

 मेन्स्ट्रुअल मैन-

पैडमैन नाम की यह फिल्म आपको बताएगी कि कैसे माहवारी, महामारी है और इससे बड़ी समस्या भारतवर्षे, आर्यावर्ते, जम्बुद्वीपे में हो ही नहीं सकती| यह फिल्म अरुणाचलम मुरुगुनाथम नाम के व्यक्ति पर बनी है जिसने सस्ते सेनेटरी नैपकिन बनाने का बीड़ा उठाया| इसके लिए उनको समाज से बहिष्कृत भी किया गया| उनकी पत्नी तक ने उनका साथ छोड़ दिया और अपनी माँ के घर वापिस चली गयी| पर किसी भी कर्मठ पुरुष की तरह अरुणाचलम अपने लक्ष्य तक पहुँच कर माने| और हम स्त्रीयों ने क्या दिया उनको बदले में, वही पुरुष के प्रति घृणा और पुरुष सत्ता को गाली| पुरुषसत्ता जब खुद पर प्रयोग कर के सेनेटरी नैपकिन बनाती है तो अच्छी लगती है मगर वही पुरुष सत्ता जब अपने लिए थोडा सा प्यार और सम्मान चाहती है तो ख़राब लगने लगती है|

जिस तरह ट्विंकल खन्ना पैडमैन फिल्म का प्रचार कर रही हैं उससे उनकी कुंठित मानसिकता का पता चलता है| फेमिनिस्म, महिलाओं को किस तरह एहसानफरामोश होना सिखाता है यह भी साफ़ दिखता है| गौरतलब है कि मेन्स्त्रुअल मैंन नाम की एक डाक्यूमेंट्री पहले ही अरुणाचलम पर बन चुकी है, इस  फिल्म में तथ्यों से छेड़छाड़ अवश्य की गयी होगी| फिल्म का ट्रेलर देखिये अक्षय कुमार कहते हैं, “ब्लडी मेन अगर आधे घंटे खून बहे तो मर जाये|” यह वो अक्षय कुमार हैं जो आर्मी आर्मी किया करते हैं| सरहद के जवानों की कहानी यह बोलते समय भूल गए| क्योंकि जब इज्ज़त मन में ना हो सिर्फ दिखावा हो तो जुबां फिसल ही जाती है| यही नहीं उन्होंने यह तक कहा कि सेना की सब्सिडी घटाकर महिलाओं को सेनेटरी नैपकिन उपलब्ध कराये जाएँ| इससे उनके मानसिक दिवालियेपन का पता चलता है| कांस्टेबल नितिन BSF का हिस्सा थे, लगातार खून बहते हुए भी गोली चलाते रहे और अंततः शहीद हुए| उनकी वजह से सीमा तोड़कर आने वाले आतंकवादी भाग खड़े हुए| यह केवल एक कहानी है, ज़रा ढूंढ कर देखिये ऐसी सैंकड़ों कहानियां मिल जाएगी हर समाज, हर देश में| पुरुषों की लाशों पर सभ्यताएं बनी हैं और आप सिर्फ एक सेनेटरी नैपकिन वाली फिल्म बेचने के लिए इतनी बेहूदी बात कर रहे हैं ? मैं फेमिनिज्म को बढ़िया आन्दोलन मान लेती अगर इस एक लाइन को हटाने के लिए महिलाएं आन्दोलन कर देती कि हमारे पुरुष ऐसे नहीं हैं| पूरा ट्रेलर देखंगे तो पायेंगे कि औरत हर जगह रो रही है, जैसे महिलाएं ही बीमार होती हैं बस पुरुष को कोई बीमारी पकड़ती ही नहीं|

कैंसर में भी केवल स्तन कैंसर की चर्चा होती है जबकि प्रोस्टेट कैंसर उससे कहीं ज्यादा होता है और पुरुष शर्म से बता भी नहीं पाते| लेकिन नहीं प्रचार तो यह है कि शर्म, लाज केवल महिला के लिए है पुरुष निरा लम्पट निर्लज्ज है| सिगरेट पर पैसे खर्च करता है मगर सेनेटरी नैपकिन पर नहीं, वाह लॉजिक! पुरुष घर खर्च के लिए पैसे देता है तो उसमे कितना झोल झाल करती हैं महिलाएं इसका कोई अंदाज़ा है क्या? मगर आप यह कह भी नहीं सकते क्योंकि महिला गँगा की भांति पवित्र होती है और पुरुष दानव| औरत खुद अपनी प्राथमिकता तय नहीं कर पाई इसमें पुरुष समाज क्या करे? पुरुष ने हर तरह की सुविधाएँ दे डाली मगर फिर भी महिला पुरुष को दोष देती घूम रही है| ट्विंकल खन्ना, सोनम कपूर और अक्षय कुमार को इस तरह की वाहियात बात करते कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि उनको एक फिल्म बेचनी है| फुल्लू नाम की फिल्म इसी विषय पर आई थी, उसमे भी यह लाइन थी, “जो औरत का दर्द नहीं समझता उसको भगवन मर्द नहीं समझता|” आप समझते रहिये औरत का दर्द, बदले में वही औरत आपके खिलाफ नफरत फैलाती रहेगी|

फेमिनिस्म के नाम पर साबुन, तेल, शैम्पू, सब बिक रहा है आपकी यह पैडमैन फिल्म भी बिक जाएगी, रह जायेगा तो सवाल क्या पुरुष को कठघरे में खड़ा करना ज़रूरी था, क्या सेना के जवानों के खून का अपमान ज़रूरी था?

– ज्योति तिवारी, पुरुष अधिकार कार्यकर्ता, लेखिका व सामाजिक सरोकार से जुड़े कार्य करती हैं. उनकी किताब ‘अनुराग‘ बेस्ट सेलर पुस्तक रही है.

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और जब वीर सावरकरजी ने कहं था भारत इजराएल का समर्थन करे तब…

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वीर विनायक दामोदर सावरकर जो हिंदू राष्ट्रवाद एवं हिंदूत्व के एक प्रभावशाली विचारक थे उन्होने कहा था के मुस्लीम एवं इसाई, जो भारत में जन्में है, वे कभी खाए नमक को नही जागेंगे क्योंकी यह उनकी पवित्र भुमी नही है । उन्होने रोहिंग्या मुस्लीम, पाकिस्तान, नक्षलवादी तथा अनेकों अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार प्रकट किए थे, जो तत्कालीन सरकारने नही माने परंतु आज स्वतंत्रता के ६८ सालों बाद भारत सरकार उन्ही के कहे मार्ग पर चलने हेतु विवश है ।
भारत ने आज तक अनेको बार पॅलेस्टाइन का साथ दिया और आज पॅलेस्टाइन इस्लामीक राष्ट्रों के समर्थन पे सिर्फ खुदको बचाने की कोशिष कर रहा है और काश्मीर को पाकिस्तान का अंग मानता है । और वही इजराएल जीसे भारत ने साथ नही दिया उसी इजराएल ने भारत को १९६२, १९७५ तथा १९९९ के चीन तथा पाकिस्तान के साथ हुए युद्धों में भारत को मदद कि । यही इजराएल भारत कि पाकिस्तान-बांग्लादेश सीमा पर रक्षा हेतु आधुनिक तकनीक प्रदान कर रहा है । यही इजराएल भारत को ड्रोन प्रदान कर रहा है । यही इजराएल भारत को खेती का आधुनिक तंत्रज्ञान, समंदर के पानी को पीने लायक बनाने कि तकनीक दे रहा है ?

पॅलेस्टाइन का समर्थन देकर भारत सरकार ने क्या पा लिया? पॅलेस्टाइन खुले तौर पर पाकिस्तान को काश्मिर मुद्दे पर समर्थन देता रहा है और इजराएल ने भारत को सदैव मदद कि है । यह सब चीजे वीर सावरकरजी को १९४७ में पता थी और भारत सरकारने उन्हें प्रताडीत किया । वे स्वातंत्रयोद्धा थे और काँग्रेस ने उन्हे जेल स्वतंत्र भारत में डाल दिया ।

वीर सावरकर ने कहां था के एक दिन आएगा जब हिंदूत्व के मुद्दो पर मतदान होगा, और उस समय काँग्रेसी नेता कोट के उपर जनेऊ पहनेंगे । गुजरात विधानसभा चुनाव के दौरान काँग्रेस के नेता इस चीज पर बहस करते सुनाई दिए कि राहुल गांधी जो की काँग्रेस पार्टी के अध्यक्ष है वे एक ‘‘जनेऊधारी हिंदू’’ है । स्वयं राहुल गांधी अनेको मंदिरों के दौरे करते हुए पाए गए । यहा तक के उत्तर प्रदेश कि एक रॅली में उन्होने स्वयं ‘‘ब्राह्मण’’ होने का दावा किया था ।

इन सब चीजो के पश्चात जवाहरलाल नेहरू, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, राहुल गांधी इन सभी काँग्रेसी नेताओं का आचरण एक ब्राह्मण्य के अनुसार नही था । जवाहरलाल नेहरू को विदेशी संस्कृती का प्रचंड आकर्षण था । इंदिरा गांधी स्वयं को एक धर्मनिरपेक्ष कहती थी । राहुल गांधी ने अमेरिका के राजदुत को यहां तक कह दिया था के भारत को मुस्लीम नही हिंदू लोगों से धोका है । आज वही काँग्रेस स्वयं को हिंदु हिंतैशी प्रस्तुत कर रही है । यही चीज वीर सावरकरजी ने सालों पहले भाँप ली थी ।

हिंदूत्व के जनक वीर वि.दा. सावरकर जी ने भारतीय सरकार को आवाहन किया था के वे संयुक्त राष्ट्रसंघ में इजराएल के निर्मीती के समर्थन में मतदान करे । परंतु तत्कालीन भारत सरकार ने कुछ और सहीं समझा । वीर सावरकर एक अत्यंत प्रखर विचारों के नेता थे, उनकी सोच बहुत दुर तक फैली थी । वे भविष्य कि एक अलग समझ रखते थे । उन्होने बताई हुई अनेक भविष्यवाणीयां सच हुई है । उन्होने इजराएल, रोहिंग्या मुस्लीम, पाकिस्तान, नक्षलवादी तथा अनेकों अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर अपने विचार प्रकट किए थे, जो तत्कालीन सरकारने नही माने परंतु आज स्वतंत्रता के ६८ सालों बाद भारत सरकार उन्ही के कहे मार्ग पर चलने हेतु विवश है ।

भारत सरकार को सच्चा दोस्त किसे हा जाए यह जानने में ६८ वर्ष लग गए, परंतु यह दोस्ती का बीज वीर सावरकरजी ने १९४७ में ही भाँप लिया था । आज ६८ वर्षो के पश्चात भारत के प्रधानमंत्री बेहिचक इजराएल गए और उनका स्वागत भी इजराएल ने उसी अंदाज में किया । ६८ वर्षे पश्चात भारत ने इजराएल को अपने सच्चे दोस्त के रूप में गले लगाया ।

ऐसे एक ना अनेक मुद्दो पें वीर सावरकरजी खरें उतरें है । उन्होंने अंतराल विज्ञान, परमाणु विज्ञान तथा अर्थशास्त्र ऐसे अनेक मुद्दो पे जो विचार व्यक्त किए है वह आज भी अनेक लोगों को अचंभीत कर देते है । अगर समय रहते भारत अपने इस वीर सपूत कि महानता का विश्वास करना सिख ले तो आने वाली भारत कि पिढीयां एक सुदृढ एवं शक्तीशाली हिंदू राष्ट्र का निर्माण कर पाएगी और तभी ‘‘वसुधैव कुढुंबकम्’’ का नारा पूर्ण होगा ।

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केन्द्रीय विद्यालयों में संस्कृत प्रार्थना पर बैन क्यों?

असतो मा सदगमय ॥ तमसो मा ज्योतिर्गमय ॥ मृत्योर्मामृतम् गमय ॥

(हमको) असत्य से सत्य की ओर ले चलो । अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो ।। मृत्यु से अमरता की ओर ले चलो ॥।

Lead me from falsehood to truth, Lead me from darkness to light, Lead me from death to the immortality.

बृहदारण्यक उपनिषद् से उद्धृत इन सूत्रों की बचपन से अनवरत प्रार्थना करते आये मेरे जैसे न जाने कितने लोग, पर आज तक ये नहीं पता चला कि इसमें भी कोई धार्मिक एंगिल हैं क्योंकि हमें हमेशा यही बताया गया और हमने यही समझा भी कि ये धर्म, सम्प्रदाय, जाति, लिंग जैसे विभेदों से बहुत ऊपर मानवमात्र के उत्थान के लिए सर्वशक्तिमान से प्रार्थना करने वाले वाक्य हैं| वसुधैव कुटुंबकम के मूलमंत्र को अपने जीवन में उतारने वाली सनातन संस्कृति के प्राचीन ग्रंथों में इस तरह की प्रार्थनायें बार बार मिलती हैं क्योंकि यह संस्कृति वो रही जिसने कभी मात्र स्वयं के लिए कुछ माँगा ही नहीं, जब भी माँगा समस्त चराचर जगत के कल्याण के लिए माँगा| परन्तु अब स्वतंत्रता के भी 70 वर्षों बाद हमें ये बताया जा रहा है कि हमारे जीवन दर्शन का आधार रहे ये सूत्र देश की धर्मनिरपेक्षता पर चोट करते हैं क्योंकि ये एक धर्म विशेष के प्राचीन ग्रंथ से लिए गए हैं|

आश्चर्य इस पर नहीं कि किसी धूर्त को इस तरह की याचिका सर्वोच्च न्यायालय में डालने की सूझी क्योंकि इस देश की प्राचीन सांस्कृतिक विरासत, मूल्यों, परम्पराओं और हर उस बात को जो सनातन संस्कृति से जुडी है, हानि पहुँचाने के लिए कितने ही हिन्दू नामधारी पर विधर्मी कामधारी दिन रात एक किये दे रहे हैं| आश्चर्य न्याय के उस कथित मंदिर में बैठे स्वघोषित भगवानों पर है जिनके लिए कभी हिन्दू एक जीवन पद्धति थी और आज उन्हें हिन्दुओं से जुडी हर बात पर आपत्ति है| वरना क्या कारण है कि जिस सर्वोच्च न्यायालय में 1 नवम्बर 2017 के आंकड़ों के अनुसार 55,259 मामले पेंडिंग हैं, जहाँ से न्याय पाने एक आदमी की पीढ़ियों की पीढ़ियाँ गुज़र जाती हैं, जहाँ जायज मामलों को लेकर न्याय पाने की उम्मीद रखने वाले लोगों को अपनी बात कहने के 2 मिनट नहीं मिलते; वहाँ अभारतीयता और हिन्दू विरोध से ग्रस्त लोगों के मामले न केवल बड़ी आसानी से सुनवाई पर आते हैं, बल्कि उन पर ये सबसे ऊँची अदालत सरकारों से जबाव तलब भी कर लेती है|

सर्वोच्च न्यायालय में बैठे न्याय के इन कथित भगवानों को ये पता होना चाहिए कि अगर केवल सनातन संस्कृति के किसी ग्रन्थ का भाग होने एवं संस्कृत में होने के कारण ‘असतो मा सद्गमय’ जैसा मंत्र देश के धर्मनिरपेक्ष चरित्र पर चोट पहुँचाने वाला माना जाएगा और उसके केंद्रीय विद्यालयों में प्रार्थना में शामिल होने पर प्रश्न खड़े किये जाएंगे तो केरल शासन, बेहरामपुर विश्वविद्यालय उड़ीसा, उस्मानिया विश्वविद्यालय आंध्र प्रदेश, कन्नूर विश्वविद्यालय केरल, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान कालीकट केरल, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान श्रीनगर, आईआई टी कानपुर और सी बी एस ई इन सभी पर बैन लगा देना होगा क्योंकि इन सभी के आदर्श वाक्य भी बृहदारण्यक उपनिषद् के उपरोक्त वाक्यों में से ही कोई ना कोई हैं|

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फिर तो इस देश में और भी बहुत कुछ बदलना होगा क्योंकि स्वयं इस देश के राष्ट्रीय वाक्य से लेकर यहाँ की रग रग में इस तरह के सूत्र वाक्य समाये हुए हैं| किस किस को खत्म करोगे अन्यायमूर्तियों, किस किस पर बैन लगाओगे?

भारतीय गणतंत्र और उसके राज्यों पर—–

भारतीय गणतंत्र–सत्यमेव जयते–मुंडकोपनिषद
केरल शासन–तमसो मा ज्योतिर्गमय–बृहदारण्यक उपनिषद्
गोवा शासन–सर्वे भद्राणि पश्यन्तु मा कश्चिद्दुःखभाग्‌भवेत्— गरुड़ पुराण

भारत की सैन्य, सामरिक और पुलिस शक्ति पर—-

भारतीय नौसेना–शं नो वरुणः–तैत्तिरीय उपनिषद
भारतीय वायुसेना–नभः स्पृशं दीप्तम्— भगवद्गीता
भारतीय तटरक्षक बल–वयं रक्षामः–बाल्मीकि रामायण
रिसर्च एन्ड एनालिसिस विंग (RAW)–धर्मो रक्षति रक्षित–मनुस्मृति
उत्तर प्रदेश पुलिस–परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्–भगवतगीता

भारत की शिक्षण संस्थाओं पर—-

मैसूर विश्वविद्यालय–ना हि ज्ञानेन इति सदृशं–भगवतगीता
गुजरात राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय–आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः–ऋग्वेद
केंद्रीय विद्यालय–तत् त्वं पूषन्नपावृणु–ईशावास्य उपनिषद
नेशनल एकेडमी ऑफ़ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च यूनिवर्सटी–धर्मे सर्वं प्रतिष्ठितम्–महानारायण उपनिषद

भारतीय गणतंत्र के संस्थानों पर—-

जीवन बीमा निगम–योगक्षेमं वहाम्यहम्–भगवतगीता
भारतीय पर्यटन विकास संस्थान–अतिथि देवो भवः–तैत्तिरीय उपनिषद
भारतीय रिजर्व बैंक (बैंकर्स ट्रेनिंग कॉलेज)–बुद्धौ शरणमन्विच्छ–भगवतगीता
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग–आदित्यात् जायते वृष्टिः–मनुस्मृति

ये तो कुछ उदाहरण भर हैं और ऐसे अनगिनत संस्थान और संगठन हैं जो भारत की धर्मनिरपेक्षता के लिए ‘खतरा’ हैं; तो ऐसा करो ‘अ’न्याय के ‘भगवानों’, धर्मनिरपेक्षता का ढिंढोरा पीटने के लिए इन सब को बंद कर दो| पर उससे पहले अपने उस कथित मंदिर को भी जिसमें बैठ कर तुमलोग धतकरम कर रहे हो| आखिर उसका आदर्श वाक्य ‘यतो धर्मस्ततो जयः’ भी तो हिन्दुओं के ही ग्रन्थ महाभारत से ही लिया गया है|

 विशाल अग्रवाल (लेखक भारतीय इतिहास और संस्कृति के गहन जानकार, शिक्षाविद, और राष्ट्रीय हितों के लिए आवाज़ उठाते हैं। भारतीय महापुरुषों पर लेखक की राष्ट्र आराधक श्रृंखला पठनीय है।)

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ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच का अन्योन्याश्रय संबध

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सोशल मीडिया  पर एक गैंग तैयार हो गया है जो ब्राह्मण और राजपूतों के मध्य  मतभेद तैयार कर रहा है।आज कई ग्रंथो से खोज-खबर करने के बाद उनकों उत्तर देना चाहुंगा। ऐसे तो खोज-खबर करने के बाद 25-30 श्लोक और कई प्रसंग मिला जो ब्राह्मण और क्षत्रिय का अन्योन्याश्रय संबध बताता है। लेकिन लेख की सीमा देखते हुए दो चार ही प्रस्तुत कर पाऊंगा।

यजुर्वेद का एक मंत्र है,

“यत्रं ब्रह्मचक्षत्रं च सम्यंचौ चरतः सह। तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना।”

जिसका अर्थ है- जहाँ ब्रह्मतेज और क्षत्रबल एक साथ मिले हुए क्रियाशील हैं, जहाँ देव (ब्राह्मण) अग्नि (क्षत्रिय) के साथ है, मैं उस देश को पुण्य जानूं तथा वहीं रहूँ।

महाभारत के वनपर्व में भी अनेक श्लोक हैं–

“ब्रह्मक्षत्रेण संसृष्ट क्षत्रं च ब्रहम्णा सह। उदीर्णे दहतः शत्रून् वनानीवानिमारूत्तौ।”

अर्थ – ब्रह्मक्षत्र से तथा क्षत्र ब्रह्म से मिला हुआ हो तो प्रचण्ड ये दोनों सभी शत्रुओं को ऐसे जला डालते है जैसे अग्नि और वायु वनों का।

“ब्राह्मण्यनुपमा दृष्टिः क्षात्र मप्रतिबलम्। तौ यदा चरतः सार्ध तदा लोकः प्रसीदति।”

अर्थ – ब्राह्मण की ज्ञाण दृष्टि अनुपम है और क्षत्रिय का बल बेजोङ है। जब ये दोनों साथ रहते हैं तो संसार प्रसन्न रहता है।

“अग्रतः चतुरो वेदाः प्रष्ठतः सशरोधनु। इंदं ब्राह्मां इदं क्षात्रं  शास्त्रदपि स्वराष्ट्रधर्मपि।”

अर्थ – चारों वेदों की प्रमाणिकता और धनुष बाण के बल से धर्म की पुष्टि करो। ब्राह्मण शास्त्र के बल पर और क्षत्रिय शस्त्र बल से स्वधर्म और स्वदेश की रक्षा करे।

ब्राह्मणों ने क्षत्रियों ने पुत्र से भी बढकर माना है

इस प्रसंग में रघुवंश और महाभारत से एक-एक प्रसंग रखना चाहूँगा। “एक ब्राह्मण के घर पर क्षत्रिय बालक नीति ज्ञान ले रहा था। उस ब्राह्मण देव के घर पङा अन्न तेज बारिश में बह जाता है। जिसके कारण उस ब्राह्मण का बच्चा और क्षत्रिय बालक भूख से व्याकुल हो उठते हैं। उन दोनों बालकों को भूखा देखकर ब्राह्मण भिक्षा मांगकर दो रोटी लाते हैं। तभी उनको याद आता है कि आज घर पर भोजन नहीं पका है, इसलिए गो-ग्रास भी नही दिया है। तो वे एक रोटी अपनी गैय्या को खिला देते हैं। बाकी एक रोटी अपनी पत्नी के हाथ पर रख देते हैं। दोनों पति-पत्नी विचार करते हैं दोनों बच्चों को ही खिला दिया जाए। पत्नी जब पहले अपने पुत्र को रोटी खिलाने लगती है तभी वह ब्राह्मण कहते हैं- “रुको देवी! यह अधर्म है इस पूरी रोटी पर अधिकार उस क्षत्रिय बालक का है। क्योंकी वह एक भविष्य का राजा है। वह भूख का शिकार हो जाएगा तो राज्य अनाथ रहेगा। राजसिंहासन सूना रहेगा। वही हमारा बालक शिकार होगा तो केवल यह हमारे लिए। यह कहकर उस रोटी को अपनी पत्नी से छीन लेते हैं और जाकर उस क्षत्रिय बालक को खिला देते हैं। आगे चलकर वह बालक राजा दिलीप बनते हैं और ब्राह्मण के उस परोपकारी रोटी का कमाल यह था कि राजा दिलीप इतने परोपकारी होते हैं कि एक गाय को बचाने के लिए अपना शरीर शेर को देने के लिए तैयार हो जाते हैं।

दूसरा प्रसंग महाभारत का है –” एक बार अश्वथामा अपने पिता गुरू द्रोणाचार्य के पास यह कहने लगता है पिता जी आप महर्षि परशुराम के बाद सबसे अच्छा धनुर्धारी है यदि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी आपको बनाना ही है तो अर्जुन के बजाए मुझे बनाइये तब द्रोणाचार्य बोलते हैं, “अश्वत्थामा तुम तो केवल मेरे पुत्र हो। लेकिन अर्जुन समूचे हस्तिनापुर का पुत्र है। तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन भी जाओगे तो क्या करोगे? किंतु अर्जुन बनेगा तो वह देश और धर्म की रक्षा करेगा।

जब कभी क्षत्रिय वंश के आस्तित्व खतरे में पङा तब ब्राह्मणों ने आगे आकर रक्षा की

(1) सूर्यवंश के राजा वेन जो निःसंतान ही परलोक सुधार गये तो ऋषियों ने उनके शरीर को मंथन कर मंत्रबल से पृथु को प्रकट किया जिन्होने पूरी पृथ्वी पर शासन किया था।

(2) ठीक इसी तरह सूर्यवंश के दूसरे धरा के निःसंतान राजा के शरीर को मथ कर ऋषियों ने मिथि को उत्पन्न किया गया जिन्होनें मिथिला राज्य की स्थापना की।

(3) राजा दशरथ को पुत्र नहीं हो रहा था तो ब्राह्मण जमाता मुनि की युक्ति से वंश की रक्षा हुई।

(4) चंद्र वंश क्षत्रियों की तो उत्पति ही एक ब्राह्मण तपस्वी से हुई है। महर्षि अत्रि के पुत्र हुए चंद्र और उनसे जो वंश चला वह चंद्रवंश के रूप में ख्यात हुआ।

(5) भीष्म के ब्रह्मचर्य रहने के प्रतिज्ञा के कारण जब भरत वंश के आस्तित्व पर संकट आया तो महर्षि वेदव्यास ने उस वंश की रक्षा की।

राजपूत भी ब्राह्मणों को रक्षा करने के लिए खुद के जान दांव पर लगा देते थे

वें ब्राह्मणों के रक्षा के लिए प्राथमिकता देते थे। ग्रंथो में तो अनेक वृतांत है किंतु इस पर मध्यकालीन इतिहास से चर्चा करना चाहुंगा।

(1) एक बार महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह लङ रहे थे तभी बिच बचाव करने राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल को शक्ति सिंह की तलवार लग गई इस घटना से महाराणा प्रताप इतने नाराज हो गये कि उन्होने तत्काल अपने भाई सिंह को राज्य से निकाल दिया।

(2) राजा कान्हङदेव अपने पुत्र विरमदेव की शादी खिलजी के बेटी फिरोजा से करने को इंकार कर दिया तो खिलजी ने 1310 बाङमेर पर आक्रमण कर भव्य महावीर मंदिर को तोङ दिया और भीनमाल से 45 हजार श्री माली वेद पाठी ब्राह्मणों को बंदी बना कर मेवाङ के खुडाला गांव में बंद कर दिया। तब उन ब्राह्मणों को छुङाने के लिए राजा कान्हङदेव चौहान ने आस-पास के सभी राजाओं को निमंत्रण भेजा जिसमें सोलंकी, गोहिल, राठौर ,परमार चंदेल और चावङा राजाओं ने राजा कान्हङदेव के साथ मिलकर खुडाला गांव में खिलजी के सेना पर आक्रमण कर 45 हजार ब्राह्मणों को छुङवाया। इस युद्ध में साल्हा सिंह ,शोभीत लाखन सिंह और अजय सिंह मोल्हावाल मारे गये थे।

(3) मेवाङ से हार के बाद लौटते समय महमूद ने 30 नवम्बर 1442 को कुंभलगढ के पास केलवाङा गांव के निकट बाणमाता मंदिर पर आक्रमण कर मंदिर तोङ डाला और मंदिर के पास रहने वाले 50 ब्राह्मण परिवारों के 140 लोगों को बंदी बना लिया। तब दो राजपूत सरदार भाला सिंह परिहार और वीर दीप सिंह ने घनघोर युद्ध कर ब्राह्मणों को तो छुङा लिया लेकिन इतने घायल हो गये थे कि वीरगति प्राप्त हो गये।

(4) 16 अगस्त 1679 को औरंगजेब के फौजदार तहवार खां ने जब पुष्कर तिर्थ पर आक्रमण कर दिया और वहां रहने वाले 80 ब्राह्मण परिवारों को बंदी बना लिया तो आलणियावास के राज सिंह राठौङ ,हरि सिंह राठौङ तथा केसरी सिंह राठौङ ने तीन दिनों तक घोर युद्ध कर पुष्कर तिर्थ की रक्षा की और 80 ब्राह्मण परिवारों को छुङवाया।

(5) 1679 में कारतलब खां और दराब खां ने खण्ठोले मंदिर पर जब आक्रमण कर मंदिर के 11 पूजारीयों को बंदी बनाकर खजाने के लिए पूछताछ करने लगा तो सुजान सिंह शेखावट, इंद्रभाण सुजान सिंह आदी ने अपना बलिदान देकर आक्रमण को निष्फल किया और ब्राह्मणों को छुङवाया।

अतः संक्षेप रूप से यह कहना चाहुंगा ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच  अन्योनाश्रय संबध है दोनों ने एक-दूसरे को मान-सम्मान दिया है जो क्षत्रिय इतिहास और राजाओं के वीरता पर अंगुली उठा रहा है उसका DNA कदापि ब्राह्मण का नहीं हो सकता और जो क्षत्रिय ब्राह्मणों का मान-सम्मान और निरादर कर रहा हो उसका DNA एक क्षत्रिय का नही हो सकता।

 – संजीत सिंह

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ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच का अन्योन्याश्रय संबध

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सोशल मीडिया  पर एक गैंग तैयार हो गया है जो ब्राह्मण और राजपूतों के मध्य  मतभेद तैयार कर रहा है।आज कई ग्रंथो से खोज-खबर करने के बाद उनकों उत्तर देना चाहुंगा। ऐसे तो खोज-खबर करने के बाद 25-30 श्लोक और कई प्रसंग मिला जो ब्राह्मण और क्षत्रिय का अन्योन्याश्रय संबध बताता है। लेकिन लेख की सीमा देखते हुए दो चार ही प्रस्तुत कर पाऊंगा।

यजुर्वेद का एक मंत्र है,

“यत्रं ब्रह्मचक्षत्रं च सम्यंचौ चरतः सह। तं लोकं पुण्यं प्रज्ञेषं यत्र देवाः सहाग्निना।”

जिसका अर्थ है- जहाँ ब्रह्मतेज और क्षत्रबल एक साथ मिले हुए क्रियाशील हैं, जहाँ देव (ब्राह्मण) अग्नि (क्षत्रिय) के साथ है, मैं उस देश को पुण्य जानूं तथा वहीं रहूँ।

महाभारत के वनपर्व में भी अनेक श्लोक हैं–

“ब्रह्मक्षत्रेण संसृष्ट क्षत्रं च ब्रहम्णा सह। उदीर्णे दहतः शत्रून् वनानीवानिमारूत्तौ।”

अर्थ – ब्रह्मक्षत्र से तथा क्षत्र ब्रह्म से मिला हुआ हो तो प्रचण्ड ये दोनों सभी शत्रुओं को ऐसे जला डालते है जैसे अग्नि और वायु वनों का।

“ब्राह्मण्यनुपमा दृष्टिः क्षात्र मप्रतिबलम्। तौ यदा चरतः सार्ध तदा लोकः प्रसीदति।”

अर्थ – ब्राह्मण की ज्ञाण दृष्टि अनुपम है और क्षत्रिय का बल बेजोङ है। जब ये दोनों साथ रहते हैं तो संसार प्रसन्न रहता है।

“अग्रतः चतुरो वेदाः प्रष्ठतः सशरोधनु। इंदं ब्राह्मां इदं क्षात्रं  शास्त्रदपि स्वराष्ट्रधर्मपि।”

अर्थ – चारों वेदों की प्रमाणिकता और धनुष बाण के बल से धर्म की पुष्टि करो। ब्राह्मण शास्त्र के बल पर और क्षत्रिय शस्त्र बल से स्वधर्म और स्वदेश की रक्षा करे।

ब्राह्मणों ने क्षत्रियों ने पुत्र से भी बढकर माना है

इस प्रसंग में रघुवंश और महाभारत से एक-एक प्रसंग रखना चाहूँगा। “एक ब्राह्मण के घर पर क्षत्रिय बालक नीति ज्ञान ले रहा था। उस ब्राह्मण देव के घर पङा अन्न तेज बारिश में बह जाता है। जिसके कारण उस ब्राह्मण का बच्चा और क्षत्रिय बालक भूख से व्याकुल हो उठते हैं। उन दोनों बालकों को भूखा देखकर ब्राह्मण भिक्षा मांगकर दो रोटी लाते हैं। तभी उनको याद आता है कि आज घर पर भोजन नहीं पका है, इसलिए गो-ग्रास भी नही दिया है। तो वे एक रोटी अपनी गैय्या को खिला देते हैं। बाकी एक रोटी अपनी पत्नी के हाथ पर रख देते हैं। दोनों पति-पत्नी विचार करते हैं दोनों बच्चों को ही खिला दिया जाए। पत्नी जब पहले अपने पुत्र को रोटी खिलाने लगती है तभी वह ब्राह्मण कहते हैं- “रुको देवी! यह अधर्म है इस पूरी रोटी पर अधिकार उस क्षत्रिय बालक का है। क्योंकी वह एक भविष्य का राजा है। वह भूख का शिकार हो जाएगा तो राज्य अनाथ रहेगा। राजसिंहासन सूना रहेगा। वही हमारा बालक शिकार होगा तो केवल यह हमारे लिए। यह कहकर उस रोटी को अपनी पत्नी से छीन लेते हैं और जाकर उस क्षत्रिय बालक को खिला देते हैं। आगे चलकर वह बालक राजा दिलीप बनते हैं और ब्राह्मण के उस परोपकारी रोटी का कमाल यह था कि राजा दिलीप इतने परोपकारी होते हैं कि एक गाय को बचाने के लिए अपना शरीर शेर को देने के लिए तैयार हो जाते हैं।

दूसरा प्रसंग महाभारत का है –” एक बार अश्वथामा अपने पिता गुरू द्रोणाचार्य के पास यह कहने लगता है पिता जी आप महर्षि परशुराम के बाद सबसे अच्छा धनुर्धारी है यदि सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी आपको बनाना ही है तो अर्जुन के बजाए मुझे बनाइये तब द्रोणाचार्य बोलते हैं, “अश्वत्थामा तुम तो केवल मेरे पुत्र हो। लेकिन अर्जुन समूचे हस्तिनापुर का पुत्र है। तुम सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर बन भी जाओगे तो क्या करोगे? किंतु अर्जुन बनेगा तो वह देश और धर्म की रक्षा करेगा।

जब कभी क्षत्रिय वंश के आस्तित्व खतरे में पङा तब ब्राह्मणों ने आगे आकर रक्षा की

(1) सूर्यवंश के राजा वेन जो निःसंतान ही परलोक सुधार गये तो ऋषियों ने उनके शरीर को मंथन कर मंत्रबल से पृथु को प्रकट किया जिन्होने पूरी पृथ्वी पर शासन किया था।

(2) ठीक इसी तरह सूर्यवंश के दूसरे धरा के निःसंतान राजा के शरीर को मथ कर ऋषियों ने मिथि को उत्पन्न किया गया जिन्होनें मिथिला राज्य की स्थापना की।

(3) राजा दशरथ को पुत्र नहीं हो रहा था तो ब्राह्मण जमाता मुनि की युक्ति से वंश की रक्षा हुई।

(4) चंद्र वंश क्षत्रियों की तो उत्पति ही एक ब्राह्मण तपस्वी से हुई है। महर्षि अत्रि के पुत्र हुए चंद्र और उनसे जो वंश चला वह चंद्रवंश के रूप में ख्यात हुआ।

(5) भीष्म के ब्रह्मचर्य रहने के प्रतिज्ञा के कारण जब भरत वंश के आस्तित्व पर संकट आया तो महर्षि वेदव्यास ने उस वंश की रक्षा की।

राजपूत भी ब्राह्मणों को रक्षा करने के लिए खुद के जान दांव पर लगा देते थे

वें ब्राह्मणों के रक्षा के लिए प्राथमिकता देते थे। ग्रंथो में तो अनेक वृतांत है किंतु इस पर मध्यकालीन इतिहास से चर्चा करना चाहुंगा।

(1) एक बार महाराणा प्रताप और शक्ति सिंह लङ रहे थे तभी बिच बचाव करने राजपुरोहित नारायणदास पालीवाल को शक्ति सिंह की तलवार लग गई इस घटना से महाराणा प्रताप इतने नाराज हो गये कि उन्होने तत्काल अपने भाई सिंह को राज्य से निकाल दिया।

(2) राजा कान्हङदेव अपने पुत्र विरमदेव की शादी खिलजी के बेटी फिरोजा से करने को इंकार कर दिया तो खिलजी ने 1310 बाङमेर पर आक्रमण कर भव्य महावीर मंदिर को तोङ दिया और भीनमाल से 45 हजार श्री माली वेद पाठी ब्राह्मणों को बंदी बना कर मेवाङ के खुडाला गांव में बंद कर दिया। तब उन ब्राह्मणों को छुङाने के लिए राजा कान्हङदेव चौहान ने आस-पास के सभी राजाओं को निमंत्रण भेजा जिसमें सोलंकी, गोहिल, राठौर ,परमार चंदेल और चावङा राजाओं ने राजा कान्हङदेव के साथ मिलकर खुडाला गांव में खिलजी के सेना पर आक्रमण कर 45 हजार ब्राह्मणों को छुङवाया। इस युद्ध में साल्हा सिंह ,शोभीत लाखन सिंह और अजय सिंह मोल्हावाल मारे गये थे।

(3) मेवाङ से हार के बाद लौटते समय महमूद ने 30 नवम्बर 1442 को कुंभलगढ के पास केलवाङा गांव के निकट बाणमाता मंदिर पर आक्रमण कर मंदिर तोङ डाला और मंदिर के पास रहने वाले 50 ब्राह्मण परिवारों के 140 लोगों को बंदी बना लिया। तब दो राजपूत सरदार भाला सिंह परिहार और वीर दीप सिंह ने घनघोर युद्ध कर ब्राह्मणों को तो छुङा लिया लेकिन इतने घायल हो गये थे कि वीरगति प्राप्त हो गये।

(4) 16 अगस्त 1679 को औरंगजेब के फौजदार तहवार खां ने जब पुष्कर तिर्थ पर आक्रमण कर दिया और वहां रहने वाले 80 ब्राह्मण परिवारों को बंदी बना लिया तो आलणियावास के राज सिंह राठौङ ,हरि सिंह राठौङ तथा केसरी सिंह राठौङ ने तीन दिनों तक घोर युद्ध कर पुष्कर तिर्थ की रक्षा की और 80 ब्राह्मण परिवारों को छुङवाया।

(5) 1679 में कारतलब खां और दराब खां ने खण्ठोले मंदिर पर जब आक्रमण कर मंदिर के 11 पूजारीयों को बंदी बनाकर खजाने के लिए पूछताछ करने लगा तो सुजान सिंह शेखावट, इंद्रभाण सुजान सिंह आदी ने अपना बलिदान देकर आक्रमण को निष्फल किया और ब्राह्मणों को छुङवाया।

अतः संक्षेप रूप से यह कहना चाहुंगा ब्राह्मण और क्षत्रिय के बीच  अन्योनाश्रय संबध है दोनों ने एक-दूसरे को मान-सम्मान दिया है जो क्षत्रिय इतिहास और राजाओं के वीरता पर अंगुली उठा रहा है उसका DNA कदापि ब्राह्मण का नहीं हो सकता और जो क्षत्रिय ब्राह्मणों का मान-सम्मान और निरादर कर रहा हो उसका DNA एक क्षत्रिय का नही हो सकता।

 – संजीत सिंह

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क्षमा कीजिएगा, आपका फिल्मी डांस कला नहीं काला है

आदरणीय शिव कुमार जी ने फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को लेकर कल उचित चिन्ता व्यक्त की है। एक और विधा की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। टीवी पर तो विशेषकर रियलिटी डांस शोज की भरमार आ गई है। नंगा नाचने वाले ये लोग खुद को कलाकार कहते हैं और अपने देहसटाओ प्रतियोगिता को नृत्य।

क्या dance और नृत्य एक ही बातें हैं?  

आचार्य धनंजय ने दशकरुपक(1/9) में नृत्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि
“नृत्य भावों पर आश्रित होता है- ‘भावाश्रयं नृत्य’।”

अभिनय दर्पण (श्लोक 16) के अनुसार नृत्य रस, भाव तथा व्यंजना का प्रदर्शित रूप है। इस नृत्य का आयोजन सभा और राजदरबार में किया जाना चाहिए।

“रस भावव्यंजनादियुक्तम नृत्यमितीर्यते।
एतन्नृत्यं महाराज सभायां कल्पयेत सदा॥”

मंदिर कितने महत्वपूर्ण होते हैं ये इस ऐतिहासिक तथ्य से जानिए कि भारतवर्ष के लगभग सभी नृत्य शैलियों का आविष्कार और विकास मंदिरों में हुए। और फिर वहाँ से राज-दरबार होते हुए आमजन तक पहुंचे। यह भी कि मंदिर केवल प्रार्थनास्थल नहीं होते।

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नृत्य भारतीय सँस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है

मनुष्य का सामाजिक,धार्मिक जनजीवन नृत्य से अछूता नहीं रह सकता। वैदिक काल से नृत्य का भारतीय जनमानस से किसी न किसी प्रकार का सम्बँध रहा है। सँस्कृत के ऐक श्लोक के माध्यम से, नृत्य का महत्व, यों बतलाया गया है….

यो नृत्यति प्रहृष्टात्मा भावैरत्यन्तभक्तितः
स निर्दहति पापानि जन्मान्तरगतैरपि ।।

अर्थात जो प्रसन्नचित्त हो, श्रद्धा भक्तिपूर्वक, निशच्छल भाव से नृत्य करते हैं, वे सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाते हैं।

इतना ही नहीं हमारे,धर्मगृँथ, और काव्यशास्श्त्र, यहॉ तक कि वेद भी नृत्य की महिमा से भरे हैं।
ऋग्वेद का एक श्लोक है..

“अधि-पेशॉसि वपते नूतूरिव…”

अर्थात, जिस प्रकार नर्तकी, अनेक मुद्राओं से अनेक रूप धारण करती है, वैसे ही प्रातःकाल पूर्व ऊषा अनेक रूप भरती है.

नृत्य की बॉंकी अदाओं, नर्तकियों की सुरदुर्लभ चितवन ने हमारे कवियों को भी आकर्षित किया है….

कवि केशव कहते हैं..

“नूपुर के सुरन के अनुरूप ता नै लेत पग
तल ताल देत अति मन भायौ री ।..”

यानि कि हे सखि ,उसे घुँघरूओं के सुर(ध्वनि)के अनुरूप पदचाल,और उस पर तालियॉ बजाने में बडा आनन्द आया है.

विद्यापति तो नृत्य को परिभाषित करने में काफी आगे निकल गये हैं.वह कहते हैं…..

डम-डम डम्फ डिमिक डिम मादल,रून-झुन मँजिर बोल
किँकिन रन रनि बलआ कनकनि,निधुबन रास तुमुल उतरोल।

पूरा अर्थ समझना तो मेरे लिये कठिन है,पर जितना समझ पाया हूँ,उसके अनुसार वे कहते हैं..डमरू की थाप और मँजीरो की मधुर ध्वनि के साथ,मिट्टी और बालू(रेत) के कण-कण में कृष्ण के नृत्य से मन भर गया।

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हिंदी सिनेमा में, हमारे किशोरावस्था की वयःसंधि में कभी मीनाक्षी शेषाद्रि और माधुरी दीक्षित के नृत्य को देख ‘क्रश’ हो आया था।

आज का फिल्मी नृत्य तो जुगुप्सा उत्पन्न करता है ..अजब गजब अश्लील डांस लासा सालसा चिपक चिपकू चिपकाउ ..पता नहीं क्या क्या।

आज का नृत्य सर्कस में तब्दील हो चुका है..उस पर भरतमुनि का प्रभाव कम वात्स्यायन का प्रभाव ज्यादा है.. मानसरोगों में वृद्धि करते ये ‘डांस’ अगली पीढ़ी को अस्वस्थ कर सकते हैं..वर्तमान नाट्यविधा का उद्देश्य क्या रह गया है? भरतमुनि सोच रहे होंगे….-

दु:खार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्
विश्रान्ति जननं लोके नाट्यमेतद् भविष्यति…

समर्थक और ऐसे नाचने नचाने वाले कुछ भी तर्क दे सकते हैं। सही भी है,किसी भी कला के श्रेष्ठ होने का मापदण्ड क्या है? यह कौन तय करेगा कि एक प्रकार की कला दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ है? यह विवाद कि शास्त्राीय कलाएं लोक कलाओं से श्रेष्ठ हैं, और लोक कलाऐं शास्त्राीय कलाओं के मुकाबले आम इंसान के जीवन के ज्यादा करीब हैं, देखा जाए तो यह सारे विवाद बेबुनियाद, खोखले और अनावश्यक हैं।

नृत्य का परिणाम सुख होता था,
डांस का परिणाम, शारीरिक चोट और अवसाद होता है।

एक बहुत सुंदर श्लोक याद आ गया नाट्यसंग्रह ग्रन्थ का-

यतो हस्तस्ततो दृष्टिः यतो दृष्टिस्ततो मनः।
यतो मनस्ततो भावो यतो भावस्ततो रसः॥

जहाँ हाँथ जाता है वहाँ आँख जाती है जहाँ आँख वहाँ मन जहाँ मन वहाँ भाव जहाँ भाव वहाँ रस… नृत्य का यही रहस्य है !!

वहीदा रहमान, मधुबाला, आशा पारिख, हेमा मलिनी, साधना, औऱ वो,
“होठों में ऐसी बात मै दबाकर चली आई” गाने पर नृत्य करने वाली हिरोइन, जिनका नाम भूल रहा हूँ, से लेकर मीनाक्षी शेषाद्रि औऱ माधुरी दीक्षित तक।
बस यही है हिन्दी फिल्मों का स्वर्णिम नृत्य इतिहास।
समझने वाली बात तो ये है कि इनके पूर्ववर्ती कलाकार अधिकाँश तवायफों के परिवार से थी लेकिन इन लोगों ने फिल्मों में अपनी अलग मर्यादा बनाया। नैतिकता के उच्च मापदंड स्थापित किये।

एक आजकल की हीरोइनें हैं, अच्छे खासे परिवार से आकर वैश्या जैसे चरित्र निभा रही हैं। नृत्य के नाम पर उभरते कूल्हे औऱ वक्ष दिखा रही हैं। सम्भोग की मुद्रा में नृत्य दिखा रही हैं।

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क्या अब मान ही लिया जाय कि शास्त्रीय नृत्य का स्वर्णिम काल समाप्ति कि ओर है ?
अब हमें उघडे जाँघ, उभरे वक्ष औऱ बेतरतीब कमर औऱ नितम्ब मटकाने को ही नृत्य मान लेना चाहिए ?

अर्थातुराणाम न सुह्रिन्न बन्धु: – कामातुराणाम न भयं न लज्जा
चिंतातुराणाम न सुखं न निद्रा –
क्षुधातुराणाम न बलं न तेजः।

किसी देश को बर्बाद करना हो तो सबसे सस्ता और सरल तरीका है कि उस देश के बच्चों को बाल्यावस्था में ही कामातुर बना दो।
और यह काम बड़े मनोयोग से मीडिया , सिनेमा, टीवी एवं देशी खाल ओढ़े हुए विदेशी शासकों द्वारा किया जा रहा है।

क्षमा कीजिएगा आपका फिल्मी डांस कला नहीं है, काला है !!

 – डॉ. मधुसूदन उपाध्याय, लेखक भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला, धर्म एवं आध्यात्म के गहन जानकार हैं।

यह भी पढ़िए,

सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के सामाजिक एवं आर्थिक निहितार्थ

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क्षमा कीजिएगा, आपका फिल्मी डांस कला नहीं काला है

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आदरणीय शिव कुमार जी ने फिल्मों में बढ़ती अश्लीलता को लेकर कल उचित चिन्ता व्यक्त की है। एक और विधा की तरफ ध्यान देने की आवश्यकता है। टीवी पर तो विशेषकर रियलिटी डांस शोज की भरमार आ गई है। नंगा नाचने वाले ये लोग खुद को कलाकार कहते हैं और अपने देहसटाओ प्रतियोगिता को नृत्य।

क्या dance और नृत्य एक ही बातें हैं?  

आचार्य धनंजय ने दशकरुपक(1/9) में नृत्य को परिभाषित करते हुए लिखा है कि
“नृत्य भावों पर आश्रित होता है- ‘भावाश्रयं नृत्य’।”

अभिनय दर्पण (श्लोक 16) के अनुसार नृत्य रस, भाव तथा व्यंजना का प्रदर्शित रूप है। इस नृत्य का आयोजन सभा और राजदरबार में किया जाना चाहिए।

“रस भावव्यंजनादियुक्तम नृत्यमितीर्यते।
एतन्नृत्यं महाराज सभायां कल्पयेत सदा॥”

मंदिर कितने महत्वपूर्ण होते हैं ये इस ऐतिहासिक तथ्य से जानिए कि भारतवर्ष के लगभग सभी नृत्य शैलियों का आविष्कार और विकास मंदिरों में हुए। और फिर वहाँ से राज-दरबार होते हुए आमजन तक पहुंचे। यह भी कि मंदिर केवल प्रार्थनास्थल नहीं होते।

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नृत्य भारतीय सँस्कृति का एक अभिन्न हिस्सा है

मनुष्य का सामाजिक,धार्मिक जनजीवन नृत्य से अछूता नहीं रह सकता। वैदिक काल से नृत्य का भारतीय जनमानस से किसी न किसी प्रकार का सम्बँध रहा है। सँस्कृत के ऐक श्लोक के माध्यम से, नृत्य का महत्व, यों बतलाया गया है….

यो नृत्यति प्रहृष्टात्मा भावैरत्यन्तभक्तितः
स निर्दहति पापानि जन्मान्तरगतैरपि ।।

अर्थात जो प्रसन्नचित्त हो, श्रद्धा भक्तिपूर्वक, निशच्छल भाव से नृत्य करते हैं, वे सौ जन्मों के पापों से मुक्त हो जाते हैं।

इतना ही नहीं हमारे,धर्मगृँथ, और काव्यशास्श्त्र, यहॉ तक कि वेद भी नृत्य की महिमा से भरे हैं।
ऋग्वेद का एक श्लोक है..

“अधि-पेशॉसि वपते नूतूरिव…”

अर्थात, जिस प्रकार नर्तकी, अनेक मुद्राओं से अनेक रूप धारण करती है, वैसे ही प्रातःकाल पूर्व ऊषा अनेक रूप भरती है.

नृत्य की बॉंकी अदाओं, नर्तकियों की सुरदुर्लभ चितवन ने हमारे कवियों को भी आकर्षित किया है….

कवि केशव कहते हैं..

“नूपुर के सुरन के अनुरूप ता नै लेत पग
तल ताल देत अति मन भायौ री ।..”

यानि कि हे सखि ,उसे घुँघरूओं के सुर(ध्वनि)के अनुरूप पदचाल,और उस पर तालियॉ बजाने में बडा आनन्द आया है.

विद्यापति तो नृत्य को परिभाषित करने में काफी आगे निकल गये हैं.वह कहते हैं…..

डम-डम डम्फ डिमिक डिम मादल,रून-झुन मँजिर बोल
किँकिन रन रनि बलआ कनकनि,निधुबन रास तुमुल उतरोल।

पूरा अर्थ समझना तो मेरे लिये कठिन है,पर जितना समझ पाया हूँ,उसके अनुसार वे कहते हैं..डमरू की थाप और मँजीरो की मधुर ध्वनि के साथ,मिट्टी और बालू(रेत) के कण-कण में कृष्ण के नृत्य से मन भर गया।

Image result for hema malini dance .
हिंदी सिनेमा में, हमारे किशोरावस्था की वयःसंधि में कभी मीनाक्षी शेषाद्रि और माधुरी दीक्षित के नृत्य को देख ‘क्रश’ हो आया था।

आज का फिल्मी नृत्य तो जुगुप्सा उत्पन्न करता है ..अजब गजब अश्लील डांस लासा सालसा चिपक चिपकू चिपकाउ ..पता नहीं क्या क्या।

आज का नृत्य सर्कस में तब्दील हो चुका है..उस पर भरतमुनि का प्रभाव कम वात्स्यायन का प्रभाव ज्यादा है.. मानसरोगों में वृद्धि करते ये ‘डांस’ अगली पीढ़ी को अस्वस्थ कर सकते हैं..वर्तमान नाट्यविधा का उद्देश्य क्या रह गया है? भरतमुनि सोच रहे होंगे….-

दु:खार्तानां श्रमार्तानां शोकार्तानां तपस्विनाम्
विश्रान्ति जननं लोके नाट्यमेतद् भविष्यति…

समर्थक और ऐसे नाचने नचाने वाले कुछ भी तर्क दे सकते हैं। सही भी है,किसी भी कला के श्रेष्ठ होने का मापदण्ड क्या है? यह कौन तय करेगा कि एक प्रकार की कला दूसरे की तुलना में श्रेष्ठ है? यह विवाद कि शास्त्राीय कलाएं लोक कलाओं से श्रेष्ठ हैं, और लोक कलाऐं शास्त्राीय कलाओं के मुकाबले आम इंसान के जीवन के ज्यादा करीब हैं, देखा जाए तो यह सारे विवाद बेबुनियाद, खोखले और अनावश्यक हैं।

नृत्य का परिणाम सुख होता था,
डांस का परिणाम, शारीरिक चोट और अवसाद होता है।

एक बहुत सुंदर श्लोक याद आ गया नाट्यसंग्रह ग्रन्थ का-

यतो हस्तस्ततो दृष्टिः यतो दृष्टिस्ततो मनः।
यतो मनस्ततो भावो यतो भावस्ततो रसः॥

जहाँ हाँथ जाता है वहाँ आँख जाती है जहाँ आँख वहाँ मन जहाँ मन वहाँ भाव जहाँ भाव वहाँ रस… नृत्य का यही रहस्य है !!

वहीदा रहमान, मधुबाला, आशा पारिख, हेमा मलिनी, साधना, औऱ वो,
“होठों में ऐसी बात मै दबाकर चली आई” गाने पर नृत्य करने वाली हिरोइन, जिनका नाम भूल रहा हूँ, से लेकर मीनाक्षी शेषाद्रि औऱ माधुरी दीक्षित तक।
बस यही है हिन्दी फिल्मों का स्वर्णिम नृत्य इतिहास।
समझने वाली बात तो ये है कि इनके पूर्ववर्ती कलाकार अधिकाँश तवायफों के परिवार से थी लेकिन इन लोगों ने फिल्मों में अपनी अलग मर्यादा बनाया। नैतिकता के उच्च मापदंड स्थापित किये।

एक आजकल की हीरोइनें हैं, अच्छे खासे परिवार से आकर वैश्या जैसे चरित्र निभा रही हैं। नृत्य के नाम पर उभरते कूल्हे औऱ वक्ष दिखा रही हैं। सम्भोग की मुद्रा में नृत्य दिखा रही हैं।

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क्या अब मान ही लिया जाय कि शास्त्रीय नृत्य का स्वर्णिम काल समाप्ति कि ओर है ?
अब हमें उघडे जाँघ, उभरे वक्ष औऱ बेतरतीब कमर औऱ नितम्ब मटकाने को ही नृत्य मान लेना चाहिए ?

अर्थातुराणाम न सुह्रिन्न बन्धु: – कामातुराणाम न भयं न लज्जा
चिंतातुराणाम न सुखं न निद्रा –
क्षुधातुराणाम न बलं न तेजः।

किसी देश को बर्बाद करना हो तो सबसे सस्ता और सरल तरीका है कि उस देश के बच्चों को बाल्यावस्था में ही कामातुर बना दो।
और यह काम बड़े मनोयोग से मीडिया , सिनेमा, टीवी एवं देशी खाल ओढ़े हुए विदेशी शासकों द्वारा किया जा रहा है।

क्षमा कीजिएगा आपका फिल्मी डांस कला नहीं है, काला है !!

 – डॉ. मधुसूदन उपाध्याय, लेखक भारतीय संस्कृति, इतिहास, कला, धर्म एवं आध्यात्म के गहन जानकार हैं।

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सौन्दर्य प्रतियोगिताओं के सामाजिक एवं आर्थिक निहितार्थ

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अल्लाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार एवं हिन्दू

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अल्लाउद्दीन खिलजी पहला मुसलमान शासक था जिसे इस्लाम के ध्वज को विन्ध्य पर्वत  के दक्षिण में फहराने का गौरव प्राप्त है. उससे पहले किसी भी मुसलमान ने भारत के इतने बड़े भूभाग का शासन नहीं किया था. यद्यपि उसकी यह विजय स्थायी नहीं सिद्ध हुई और बीस साल के भीतर ही उसका महाराज्य छिन्न भिन्न हो गया. परन्तु उसके साथ ही इस्लामिक राज्य जो सैकड़ों युद्धों के बावजूद उत्तर भारत के मैदानों तक ही सीमित था, दक्षिण के पठार एवं समुद्र तटों तक स्थापित हो गया और सरदार बल्लभभाई पटेल द्वारा निजाम को समूल नष्ट करने तक बना रहा.

जाफर खान और मालिक काफूर के नेत्रित्व में इस  विस्तृत साम्राज्य विस्तार के अतरिक्त अपने चाचा की हत्या, मंदिरों का विध्वंश, नरसंहार एवं स्त्री लोलुपता के कारणों से अल्लाउद्दीन इतिहास में कुख्यात है. परन्तु  औपनिवेशिक काल से चले आ रहे सरकारी पाठ्यक्रम में अल्लाउद्दीन से सम्बंधित जो विषय सबसे अधिक चर्चा में रहता है वो उसके राजस्व सम्बन्धी सुधार एवं आर्थिक नीतियाँ हैं

निष्पक्ष दृष्टि से देखें तो अल्लाउद्दीन एक अनपढ़,क्रूर एवं धूर्त व्यक्ति था जिसकी इस्लाम में गहरी निष्ठा थी. और उस युग में सुलतान होने के लिए यह सबसे बड़ी योग्यता थी. उसकी आर्थिक नीतियाँ एवं राजस्व सुधार  भी उसके इन्ही गुणों का परिणाम थीं, भले ही वामी एवं इस्लामी इतिहासकार बाल की खाल निकालकर उसे चाणक्य सिद्ध करने करने का प्रयास करें.

अल्लाउद्दीन की आर्थिक नीतियों की तीन  मुख्य उद्देश्य थे:

  • विशाल साम्राज्य को नियंत्रित करने के लिए सेना का खर्चा एकत्र करना
  • हिन्दू प्रजा को इतना दरिद्र बना देना की वो विद्रोह की कल्पना भी नहीं कर सके
  • इस्लाम नहीं स्वीकार करने वाले धिम्मियों को कठोर दंड देना

अपने इन तीन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अल्लाउद्दीन ने अपनी विशेष आर्थिक नीतियों को लागू किया. और पूरे इस्लाम सम्मत विधि से लागू किया. राज्य में हिन्दुओं की स्थिति क्या होनी चाहिए इसपर सुलतान ने बयाना के काजी मुगीसुद्दीन से परामर्श लिया, इसपर काजी ने सुलतान से कहा:

”शरा में हिन्दुओं को खराजगुजर (कर देने वाला) कहा गया है. जब कोई राजस्व विभाग का अधिकारी उनसे चांदी मांगे तो उनका कर्तव्य है कि बिना किसी पूछताछ के बड़ी नम्रता से उसे सोना दें. यदि अधिकारी उनके मुंह में थूके तो उसे लेने के लिए बिना हिचकिचाहट उन्हें मुंह खोल देना चाहिए. इसप्रकार के कार्यों से धिम्मी इस्लाम के प्रति अपनी आज्ञापालन की भावना का प्रदर्शन करता है. अल्लाह ने उन्हें अपमानित करने की आज्ञा दी है. पैगम्बर ने हमें उनका वध करने, लूटने तथा बंदी बनाने का आदेश दिया है. महान इमाम अबू हनीफा जैसे अधिकारी ने जिसके मार्ग का हम अनुसरण करते हैं हिन्दुओं पर जजिया लगाने की अनुमति दी है. इस्लामिक धर्माधीशों के अनुसार हिन्दुओं के केवल दो ही मार्ग हैं मृत्यु अथवा इस्लाम.”

और अल्लाउद्दीन ने पूरी निष्ठा से काजी की शिक्षा का अनुसरण किया और निम्नलिखित राजस्व/प्रशासनिक  सुधार किये:

चूंकि कृषक केवल हिन्दू थे, सुल्तान ने कृषि कर को पचास प्रतिशत लगा दिया इसके साथ ही साथ पशुओं, चरागाहों आदि पर भी अतिरक्त कर  लगाये और अहीर, गड़ेरी आदि निर्धन पशुपालक हिन्दुओं को भी दरिद्र बना दिया. राजाज्ञाएं निकाल कर हिन्दुओं की सम्पत्ति जब्त कर ली गयी. जजिया एवं जकात की दर दोगुनी कर दी गयी. खुत, मुकद्दम एवं पटवारी आदि छोटे राजस्व अधिकारी जो कि सभी हिन्दू थे उनके सारे विशेषाधिकार जब्त कर  लिए गये एवं दण्ड के बलपर अत्याचारी राजस्व कानूनों को मानने पर बाध्य किया गया. उनके लिए पशुओं एवं सम्पत्ति की सीमा निर्धारित कर दी गयी. विभिन्न करों के भुगतान के  पश्चात् कृषक हिन्दुओं के पास उपज का एक चौथाई हिस्सा ही बच पाता था.

इसका परिणाम यह हुआ कि सम्पूर्ण हिन्दू प्रजा घोर दरिद्रता एवं भुखमरी की अवस्था में पहुँच गयी. इतिहासकार बरनी लिखता है,“हिन्दू घोड़े की सवारी करने, सुंदर पोषक पहनने, अस्त्र-शस्त्र धारण करने एवं पान खाने में असमर्थ हो गये.’’ वूल्जले हेग लिखते हैं,‘सम्पूर्ण राज्य में हिन्दू दुःख एवं दरिद्रता में डूब गये’

समकालीन लेखक मुहद्दिस मौलाना शम्सुद्दीन तुर्क ने अल्लाउद्दीन की बड़ाई करते हुए लिखा है,

”सुलतान ने हिन्दुओं को लज्जित अपमानित एवं निर्धन बना दिया है. मैंने सुना है कि हिन्दुओं के बच्चे तथा औरते मुसलमानों के दरवाजों पर भीख माँगा करते हैं. ए बादशाह ए इस्लाम, तेरी  ये धर्मनिष्ठता सराहनीय है तूने मुहम्मद साहब के धर्म की भली भाँती रक्षा की है.”

अल्लाउद्दीन जिस विचारधारा को मानता था और जिसके अनुसार उसे शासन करना था उसकी दृष्टि में यह सारे कार्य न्यायोचित ठहराए जा सकते हैं किन्तु आज के युग में जब तथाकथित मानवतावद के ध्वजवाहक बड़ी निर्लज्जता से उसके समर्थन में तर्क गढ़ते हैं तो उनसे भारतवर्ष, हिन्दू समाज एवं संस्कृति के प्रति घोर घृणा एवं द्वेष की दुर्गन्ध आती है.

The post अल्लाउद्दीन खिलजी के राजस्व सुधार एवं हिन्दू appeared first on The Analyst.

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